Wednesday, September 4, 2024

लाड़ली बहन

 लाड़ली बहन


लाड़ली बहन योजना…..

क्या है यह लाड़ली बहन योजना ?

शायद है कमजोर परिवार पर,

आशा की एक धुंधली- सी किरण….

शायद है आर्थिक रूप से बेहतर बनाने की कोशिश…

या फिर शायद है उन्हें सशक्त बनाने का एक छोटा- सा प्रयास


माना,

माना कि हो गए सोचे प्रयास सफल….

लेकिन…..

इतना कर भर देने से 

क्या आपकी लाड़ली बहन है सुरक्षित कोख में….?

कोख ..?

कोख ..?..?

वह तो लोगों की सोच में भी सुरक्षित नहीं 


क्या आपने है सोचा…

आपकी लाड़ली क्या चाहती है..?

वह चाहती है…

पन्द्रह सौ रुपए खाते में मिले ना मिले 

लेकिन,

कोलकाता की लाड़ली बहन को न्याय जरूर मिले l

न्याय जरूर मिले बदलापुर की पीड़िता को, कानून सख्त बने ,

ऐसा जघन्य अपराध करने से पहले 

अपराधी सौ बार सोचे l


जान बचाने वाली देवतुल्य डॉक्टर बहन ने 

अपनी जान गंवाई है…..

नहीं है वह अब भी सुरक्षित

बात उसको समझ में आई है l


अब समय आ गया है ..

नया संकल्प चलाने का

लाड़ली बहन योजना के साथ

“लाड़ली सुरक्षा योजना” को अपनाने का

लाड़ली बहन योजना के साथ

“लाड़ली सुरक्षा योजना” को अपनाने का l


  - कु. पायल जायसवाल 

                        




Saturday, June 15, 2024

बाबू जी

 कवि संजीव सिंह जी की पिता और पुत्री  पर बनी कविता 

                       बाबू जी  


सच बात पूछती हूं बताओ ना बाबूजी 

छुपाओ ना बाबू जी 

क्या याद मेरी आती नहीं 


पैदा हुई घर में मेरे  मातम- सा छाया था 

पापा तेरे खुश थे मुझे मां ने बताया था 

ले - ले के नाम प्यार जताते भी मुझे थे

आते थे कहीं से तो बुलाते भी मुझे थे 

 मैं हूं नहीं तो किसको बुलाते हो बाबूजी...?

रुलाते हो बाबूजी

क्या याद मेरी आती नहीं .....


हर ज़िद मेरी पूरी हुई 

हर बात मानते 

बेटी थी ,मगर बेटों से

ज्यादा थे जानते 

घर कभी होली कभी दीपावली आई 

सैंडिल भी मेरी आई मेरी फ्रॉक भी आई 

अपने लिए बंडी भी न लाते थे बाबूजी 

क्या कमाते थे बाबूजी 

क्या याद मेरी आती नहीं......


सारी उमर खर्चे में कमाई में लगा दी 

दादी बीमार थी, तो दवाई में लगा दी

पढ़ने लगे हम सब तो पढ़ाई में लगा दी 

बाकी बचा वो मेरी सगाई में लगा दी 

अब किसके लिए इतना कमाते हो बाबू जी 

बचाते हो बाबू जी 

क्या याद मेरी आती नहीं.....


कहते थे मेरा मन कही एक पल लगेगा 

बिटिया विदा हुई तो घर ये घर न लगेगा

कपड़े कभी,गहने कभी सामान संजोते 

तैयारीयां भी करते थे ,

छूप - छूप थे रोते 

कर- कर के याद अब तो न रोते हो बाबू जी 

न सोते हों बाबू जी 

क्या याद मेरी आती नहीं.....


कैसी परंपरा है ये कैसा विधान है....?

पापा बता ना मेरा कौन - सा मेरा जहां है

आधा यहां आधा वहां जीवन है अधूरा

पीहर मेरा पूरा हैं न

ससुराल है पूरा

क्या आपका भी प्यार अधूरा है बाबूजी

न पूरा है बाबू जी 

क्या याद मेरी आती नहीं.....












Thursday, June 30, 2022

Sunday, April 3, 2022

मनोबल

 न निराश हो विद्यार्थियों आप 

बताती हूं आपको राज की बात

किसी भी शुभ कार्य में हवन करते हैं 

और उस हवन से आसपास का वातावरण शुद्ध करते हैं

 बस इसी तरह हमारे आसपास के वायरस को मारने के लिए ,

विद्यार्थियों में ऊर्जा शक्ति निर्माण के लिए

नियति ने भी एक विशेष हवन का आयोजन किया 

और उसी का कार्यभार भारतीय भाषाओं को सौंपा

नहीं जले हैं समिधा में केवल हिंदी ,मराठी के पेपर 

उसमें तो जला है महीनों से चला आ रहा पढ़ाई के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण

जलकर राख हुई है निराशा , दूर हुआ अंधकार है 

थकान ,असंतोष, भय ,आलस्य , चिंता की जल गई चिता  हैं 

और इसी जलते हुए पेपर की रोशनी में 

आशा की किरण नजर आई है

इन दो सालों में अगर आप पीछे हो गए हो तो ,

आपके आगे बढ़ने की गति  भी (speed) दोगुनी हो आई हैं 

जलती हुई आग की लपटों ने एक बात सिखाई है

 जल रही है वह लपट इसीलिए ऊपर जा रही है

हमें भी शिखर तक पहुंचने के लिए आग की तरह  जलना होगा

संघर्षों को पार करते हुए मंजिल को पाना होगा 


 " हिंदी और मराठी" के पेपर की आप सभी को शुभकामनाएं










Thursday, March 3, 2022

पुनः ऑफलाइन की ओर.....

 कोरोना को देकर करारा तमाचा |

पूरे महाराष्ट्र में बटेगा आज इंग्लिश का पर्चा ||

 2 साल बाद ही सही बोर्ड की परीक्षा आई है |

कमर कस ली विद्यार्थियों ने, कर ली पूरी पढ़ाई है ||

लेकर दोनों डोज़ बोर्ड नियम का पालन  किया है |

देकर प्रैक्टिकल और ओरल डर को कुछ कम किया है ||

75 % की पढ़ाई को 100 % की लगन से किया है |

रिवीजन में आई कठिनाइयों को शिक्षक द्वारा दूर किया है ||

30 मिनट मिले अतिरिक्त उसका लाभ उठाना है |

करके 80 अंकों का पेपर रिजल्ट को बेहतर बनाना है ||

गर कुछ भूल गए ,2 मिनट आंख बंद करना है |

क्या बताया था हमारे शिक्षक ने वह याद करना है ||

जितनी कठिन साधना पेपर उतना ही सरल होता है |

फूंक -फूंक कर रखना कदम एक-एक अंक जरूरी होता है ||

ऑनलाइन पढ़ाई और ऑफलाइन परीक्षा का गजब संगम है |

ऐसी स्थिति में भी जो विचलित ना हो वही नंबर वन है ||

      "परीक्षा की विद्यार्थियों को हार्दिक शुभकामनाएं"















Wednesday, January 12, 2022

सूक्तिसौरभ: |


                         तृतीय: पाठ:

               सूक्तिसौरभ:

 उपकारान् स्मरेन्नित्यम् अपकारांश्च विस्मरेत् । शुभे शैघ्यं प्रकुर्वीत अशुभे दीर्घसूत्रता ॥१॥

 १.  अन्वय: -   नित्यम् उपकारान् स्मरेत् । अपकारान् च विस्मरेत् । शुभे शैघ्यं प्रकुर्वीत । अशुभे दीर्घसूत्रता (प्रकुर्वीत) ।स्मरेत् । अपकारान् च विस्मरेत् । शुभे शैघ्यं प्रकुर्वीत । अशुभे दीर्घसूत्रता (प्रकुर्वीत) ।

मराठी भाषांतर :-

नेहमी उपकारांचे स्मरण करावे. अपकारांना नेहमी विसरावे. शुभ(चांगले) काम लवकर करावीत अशुभ कार्य करण्यात करावा. उशीर करावा.


२) सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी ।

हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रियः ।।२।।

अन्वय: - सत्यवक्ता सुखं शेते । मितव्ययी सुखं शेते। हितभुक् मितभुक् च एव (सुखं शेते) तथा एवं विजितेन्द्रियः (सुखं शेते) ।

मराठी भाषांतर :-

सत्य (खरे) बोलणारा सुखाने झोपतो. कमी खर्च करणारा सुखाने झोपतो; हितकर खाणारा व थोडे खाणारा सुखाने झोपतो तसेच ज्यांनी आपल्या ज्ञानेंन्द्रियांना जिंकले आहे तो सुखाने झोपतो.


कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।

को विदेशः सुविद्यानां कोऽप्रियः प्रियवादिनाम् ||३||

अन्वय: -  समर्थानां कः अतिभार: ? (न कश्चित् अतिभारः) व्यवसायिनां किं दूरम् ? (न किञ्चित् दूरम्) सुविद्यानां कः विदेशः ? (न कोऽपि विदेशः) प्रियवादिनां कः अप्रियः ? (न कोऽपि अप्रियः)

मराठी भाषांतर :-

३. सर्व समर्थ लोकांना कोणते ओझे? (कोणतेच नाही) व्यवसाय (व्यापार) करणाऱ्या दूरच्या अंतराचे काय? (त्याच्यासाठी दूरचे अंतर काहीच नसते) चांगल्या विद्या घेतलेल्यांना विदेश जाण्याचे (भय काय?) त्या स्वदेश किंवा विदेश यात काहीच फरक दिसत नाही, प्रिय (गोड) बोलणाऱ्यांना नावडले असे काय? (त्यांना अप्रिय असे काहीच नसते.)

Thursday, January 6, 2022

प्रजापालनार्थ राजकर्तव्यानि

 प्रजापालनार्थ राजकर्तव्यानि ।

लोगों की खातिर राजकार्ताव्यनी।


खेती,  पशुपालन और व्यापार के व्यवसाय और अनाज या पशुधन खनन या वन उपज के लाभों के बारे में बात करती है। इसलिए यह। उसके खजाने और धन की मदद से राजा उसका नाम ले सकता है (1.81.2)

जो लोग कर देने के इच्छुक हैं उन्हें खेती के लिए तैयार जमीन दी जानी चाहिए। वह भूमि जो अनुपयुक्त है और सर्प के नीचे लाई जाएगी या जगदीवाला की भूमि जिस पर खेती न करने वाले लोगों द्वारा खेती नहीं की जाती है (या जिस भूमि पर खेती नहीं की जाती है या जो व्यापारी गर्मियों के लिए आते हैं वे जानबूझकर लौटते हैं और करते हैं) कोपला को कर राहत के साथ-साथ कर छूट देते हुए राहत न मिलने दें, कहीं ऐसा न हो कि वे बड़े होकर अन्याय कर उन्हें राहत और कर छूट दे दें। जो आए या बाद में आए हैं, उन्हें कर छूट दें, और जिनकी कर छूट बंद है, उनकी देखभाल करें , पिता की तरह (26818)।


उसका काम करने वाला अधिकारी मुख्य कृषि अधिकारी को सही समय पर सभी प्रकार की सब्जियां, भांग फल, भांग और कपास के बीज, विषाक्त पदार्थ (22412) एकत्र करना चाहिए।

Tuesday, January 4, 2022

पाक विधानम् ( इडली इडलीका)

                  १. इडली / इडलिका

माषस्य विदलान् क्लिन्नान्निस्तुषान् हस्तलोडनैः। ततः सम्पेष्य पेषण्यां सम्भारेण विमिश्रितान्। स्थाल्यां विमद्ये बहुशः स्थापयेत्तदहस्ततः ।। आम्लीभूतं माषपिष्टं वटिकासु विनिक्षिपेत्। वस्त्रगर्भाभिरन्याभिः पिधाय परिपाचयेत् ।। अवतार्यात्र मरीचं चूर्णितं विकिरेदनु। घृताक्ता हिङगुसर्पिभ्याँ जीरकेण च धूपयेत्।।

अन्वयः ।

१) माषस्य क्लिन्नान् विदलान् हस्तलोडनैः निस्तुषान् कुर्यात् । ततः पेषण्यां सम्पेष्य (विविधशाकानां वा पिष्टधान्यानां वा) सम्भारेण विमिश्रितान् (पिष्टमाषान्) स्थाल्यां बहुशः विमर्द्य ततः तत् अहः स्थापयेत्। आम्लीभूतं माषपिष्टं वटिकासु विनिक्षिपेत् । अन्याभिः वस्त्रगर्भाभिः वटिकाभिः पिघाय परिपाचयेत्। अवतार्य अत्र चूर्णितं मरीचम् अनु विकिरेत्। घृताक्ताः (ताः इडलिकाः / इडल्यः) हिङगुसर्पिभ्याँ जीरकेण च धूपयेत् ।

मराठी भाषांतर

उडीदाच्या भिजलेल्या तुकड्यांना हाताने रगडून टरफल विरहित करावे. नंतर पाटा वरवंटा (खलबत्ता) यात घालून कुटून आवश्यक ते साहित्य त्यात मिसळावे नंतर ते पीठ थाळीमध्ये फेटून दिवसभर ठेवावे. आमलेले उडदाचे पीठ वाटीमध्ये घालून दुसऱ्या जाड कपड्याने वाट्या झाकून शिजवावे नंतर उतरवून मिर्ची पावडर त्यावर भूरभूरावे. तूपाने माखलेल्या त्या इडल्या हिंग, तूप व जीरपूड घालून सुगन्धित कराव्यात.

Tuesday, December 28, 2021

उत्सवप्रिया देवभूमि:

१)  गुणोत्तरो दक्षिणदिकस्थितोऽपि सह्याश्रितोऽपि द्विषतामसह्यः ।वर्वर्ति सर्वर्तुषु रम्यरूपो देशो महाराष्ट्रमिति प्रसिद्धः ॥१॥

 अन्वयः दक्षिणदिस्थितः अपि गुणोत्तरः, सह्याश्रितः अपि द्विषताम् असह्यः सर्वर्तुषु रम्यरूपः देश: 'महाराष्ट्रम्' इति प्रसिद्धः वर्वर्ति।

अर्थ : महाराष्ट्र देश जरी दक्षिणदिशेला असला तरी तो गुणांनी श्रेष्ठ आहे. 'सह्य' पर्वताचा आश्रय घेतलेला महाराष्ट्र शत्रूना जिंकण्यास असमर्थ आहे. (शत्रू जिंकू शकत नाहीत.) सर्व ऋतुमध्ये अतिशय रम्य असणारा असा हा महाराष्ट्र देश अतिशय प्रसिद्ध आहे.

स्पष्टीकरण: 'दुसरा कालिदास' असा सर्वोच्च पुरस्कार मिळविलेल्या पंडीत वसंत शेवडे महोदयांनी मोठ्या अभिमानाने श्रीदेवेदेवश्वरमहाकाव्यं या पद्यात महाराष्ट्र देशाचे वर्णन केले आहे. ते अतिशय रोचक व सरळ आहे.

महाराष्ट्र देशाने सह्याद्री पर्वताचा आश्रय घेतला आहे. दक्षिण दिशेस असणारा हा महाराष्ट्र शत्रूंना जिंकता येत नाही. या महाराष्ट्रात इयपतू नियमितपणे होतात. हा देश सर्व ऋतूंमध्ये रमणीयच दिसतो. असा हा महाराष्ट्र देश प्रसिद्ध आहे. यातून कविचे शब्दसौष्ठव स्पष्ट होते.


२) गोदावरीरोधसि रामचन्द्रः समाश्रयन् पञ्चवटी मनोज्ञाम् |उवास वन्यामवलम्ब्य वृत्तिं सहानुजो यत्र सुखं सदारः                                                                   ||२||

 अन्वयः  यत्र गोदावरीरोधसि मनोज्ञां पञ्चवर्टी समाश्रयन् सहानुजः सदारः रामचन्द्रः वन्यां वृत्तिम् अवलम्ब्य सुखम् उवास। गोदावरी नदीच्या काठावर असलेल्या मनोज (रमणीय) पंचवटीचा आश्रय घेऊन श्री रामचंद्राचा धाकटा भाऊ (लक्ष्मण) आणि पत्नी सीता यांच्या सह वनवासी वृत्तीच स्वीकार करून सुखाने राहिले.

स्पष्टीकरण: पंचवटी हा नाशिकनगराचा एक भाग आहे. हा दंडकारण्याच एक भाग आहे असे मानतात. येथे अगस्ती ऋषींचा आश्रम आहे. राम जेव्हा १४ वर्ण वनवासाला निघाला तेव्हा ते या गोदावरी तीरावरील 'पंचवटी' मध्ये राहिले वनवासी वृत्तीचा आश्रय घेऊन श्रीराम, भाऊ लक्ष्मण व पत्नी सीता यांच्यासह पंचवटीत सुखाने निघाले. यातून कवीचे कल्पनासौंदर्य दिसते.


३) तिष्ठन्मयूरेश गणेश: क्लेशानशेषानपि यत्र हन्ति । 

प्रस्तूयते प्रेमपुरे प्रमोदान्मल्लारिपूजासु च येलकोटः॥३॥ 

अन्वय : यत्र मयूरेशपुरे तिष्ठन् गणेशः अशेषान् क्लेशान् अपि हन्ति |

(यत्र) च प्रेमपुरे मल्लारिपूजासु प्रमोदात् येलकोट: प्रस्तूयते।

अर्थ : येथे मयूरेशपूरात राहणारा गणेश सर्व त्रास कष्ट नष्ट करतो •आणि प्रेमपूरामध्ये मल्लारीपूजेत आनंदाने 'येळकोट येळकोट' अशी स्तुती करतात.

स्पष्टीकरण: श्रीगणेश ती मयूरेशपुरातील प्रसिद्ध देवता आहे. प्रेमपुरात १३ व्या शतकात 'मल्लारिमाहात्म्य' या संस्कृत ग्रंथात 'मल्लारि' देवाचे वर्णन आहे. या देवाची १२ स्थाने वर्णन केलेली आहेत. 'यळकोट' शब्दाचा कर्नाटक भाषेत '७' असा अर्थ आहे. आणि 'कोट' म्हणजे कोटी असा मराठीत अर्थ आहे. मल्लारी राज्याचे ७ कोटी सैन्य होते असे ऐकीवात आहे. मल्लारी राजाने ७ वेळा शत्रुसैन्यास जिंकले म्हणून "यळकोट यळकोट जय मल्हार" अशी विजयी घोषणा भक्त करतात व मल्लारी देवाची स्तुती करतात. 



विन्यस्तहस्त: स्वनितम्बबिम्बे कल्पद्रुमो भक्तमनोरथानाम् । तिष्ठत्यपास्य श्रममिष्टकायामनादिकालादिह पाण्डुरङ्गः ॥४॥ 

अन्वयः  श्रमम् अपास्य स्वनितम्बबिम्बे विन्यस्तहस्तः भक्तमनोरथानां कल्पद्रुमः पाण्डुरङ्गः अनादिकालात् इह इष्टकायां तिष्ठति।

अर्थ :- श्रम दूर करून स्वतःच्या कमरेवर हात ठेवलेला, भक्तांचे मनोरथ पुरविण्यात कल्पवृक्ष असणारा पांडुरंग अनादिकालापासून येथे विटेवर उभा आहे.


स्पष्टीकरण : पांडुरंग हा वारकरी लोकांचा देव आहे. आषाढी व कार्तिकी एकादशीला अनेक लोक पंढरीच्या (विठ्ठलाच्या) दर्शनास जातात. पांडुरंग महाराष्ट्राचे दैवत आहे. तो बारकन्याचे कष्ट दूर करतो. भक्तांची मनोरथे पुरवितो, अनेक वर्षे भक्त लोक मोठ्या भक्तीने कितीही श्रम झाले तरी पायी चारी करतात. त्यातच त्यांना आनंद मिळतो व त्यांचे बारीत झालेले कष्ट पांडुरंग दूर करतो. कल्पवृक्ष जमा सर्वांच्या इच्छा पूर्ण करतो, तसा पांडुरंग सर्व भक्तांना कल्पद्रुमाप्रमाणे वाटतो कारण पांडुरंग त्यांच्या सर्व इच्छा पुरवितो व त्यांचे दुःख दूर करतो.


भक्तजस्तालमृदङ्गनादैगर्जन्मुहविठ्ठल विठ्ठलेति । आपाडमासे प्रतिवर्षमंत्र क्षेत्रं समागच्छति पौण्डरीकम् ॥५॥

अन्ययः अत्र प्रतिवर्षम् आषाढमासे तालमृदङ्गनादेः 'विठ्ठल इतिहुः गर्जन भक्तजः पौण्डीक क्षेत्र समागच्छति। 

 अर्थ: येथे दरवर्षी आषाढ महिन्यात टाळ आणि मृदंगांच्या नादात, घोषात आवाजात 'विठ्ठल विठ्ठल अशी वारंवार गर्जना करणारा भक्तसमूह पंढरपूर क्षेत्रात जमतो.

स्पष्टीकरण :- पंढरपूरचा 'विठ्ठल हे वारकऱ्यांचे दैवत आहे. वारकरी मोठ्या श्रद्धेने व भक्तीने विठ्ठल दर्शनासाठी पंढरपूरला जातात. नाचत विठ्ठल विठ्ठल असा टाळ मृदंगाचा गजर करत डोक्यावर तुळस घेऊन लोक आनंदाने आषाढी कार्तिकीची वारी करतात यावेळी कोणी कोणास निमंत्रण देत नाही तर उत्स्फूर्तपणे लोक दरवर्षी पांडुरंग दर्शनास येतात.


स्नातुं पवित्राम्भसि कृष्णवेण्या द्रष्टुं पदाब्जद्वयमत्रिसूनोः। अजसमागच्छति दूरदूरान्नृसिंहवाटीमिह यात्रिवर्गः ॥६॥

अन्वयः इह कृष्णवेण्या पवित्र अम्भसि स्नातुम् अत्रिसूनोः पदाब्जद्वयं द्रष्टु (च) नृसिंहवाटी दूरदूरात् यात्रिवर्ग: अजखम् आगच्छति।

अर्थ :- येथे कृष्णा नदीच्या पवित्र पाण्यात स्नान करण्यासाठी आणि अत्रिपुत्र श्री दत्तात्रेय याची पदकमळे पाहण्यासाठी नरसोबावाडीत दूरदूरहन यात्री (प्रवासी भक्त) लोकांचे समूह सतत (निरंतरपणे) येत असतात.

स्पष्टीकरण :- महाराष्ट्रातील बहुसंख्य लोक धार्मिक आहेत. दत्तस्थान असणाऱ्या नरसिंहपुरात लोक मोठ्या भक्तीने दत्ताच्या दर्शनास येतात. कृष्णा नदीच्या पवित्र पाण्यात स्नान करून पवित्र होतात. दर पौर्णिमेस नरसिंहवाडीत खूप मोठी जत्राच भरते. येथील दत्त स्थान् सर्वांच्या मनोकामना पूर्ण करणारे आहे. त्यामुळे नरसोवाडीस तीर्थक्षेत्राचा दर्जा मिळाला आहे. लोक दर्शनासाठी (दत्तात्रेयांच्या) आसुसलेले असतात. काही लोक तर दर पौर्णिमेस वारीस दर्शनास जातात.


श्रीत्र्यम्बकेशो घुसणेश्वरो वा यत्र क्वचिद् क्षेत्रमहाबलेशः । भीमाश्रयः शङ्करनामधेयः क्वचिच्छिवो राजति वैद्यनाथः ॥७॥ 

अन्वयः यत्र क्वचित् त्र्यम्बकेशः (वा) घुसूणेश्वर (वा) क्षेत्रमहाबलेशः (वा) भीमाश्रयः शङ्करनामधेयः (वा) क्वचित् वैद्यनाथ: शिव: (चा) राजति।

अर्थ : येथे क्वचित ठिकाणी त्र्यंबकेश्वर, घृष्णेश्वर किंवा क्षेत्र महाबळेश्वर किंवा भीमाश्रय ही शंकराची नावे आहेत. स्वचित ठिकाणी वैद्यनाथ म्हणूनही शिव शोभतो. 

स्पष्टीकरण :-  संपूर्ण भारतात १२ ज्योतिर्लिंगापैकी ५ महाराष्ट्रात आहेत. त्यापैकी ४ ठिकाणांचा उल्लेख या श्लोकात केला आहे. गौतमी नदीच्या काठावर त्र्यंबकेश्वर आहे. भीमशंकर हे डाकिनी येथे आहे. परळी येथे असणारे वैद्यनाथाचे नावाचे शिवस्थान अति पवित्र आहे.अशी ही सर्व ज्योतिर्लिंगे प्रसिद्ध आहेत. 


महालसाख्यां क्वचिदादधाति यत्र क्वचिद्विन्दति रेणुकाख्याम् लक्ष्मीस्वरूपा क्वचिदादिशक्तिः क्वचिद् भवानी तुलजापुरस्था ॥८॥ 

अन्वयः- यत्र आदिशक्ति: क्वचित् लक्ष्मीस्वरूपा, क्वचित् तुलजापुरस्था भवानी, क्वचित् महालसाख्याम् आदघाति, क्वचित् रेणुकाख्यां विन्दति । 

अर्थ : येथे आदिशक्ती म्हणातात ती लक्ष्मीस्वरुपात असते. तुळजापूर येथे असणारी 'भवानी देवी हे पण आदिमायेचेच रूप आहे. कोठे कोठे हिला महालसा देवी पण म्हणतात. माहूरगड येथे तिला रेणुकादेवी असे सुद्धा म्हणतात.

स्पष्टीकरण :- आदिमायेची आदिशक्तीची 3 1/2शक्तीपीठे भक्तांची खूप मोठे श्रद्धास्थाने आहेत. पण या श्लोकात ३ नच शक्तिपीठांचे वर्णन केले आहे.

१) कोल्हापुरात असलेली महालक्ष्मी 

२) माहूरगड येथे असलेली रेणुकादेवी

३) तुळजापूर येथे असलेली भवानीदेवी 

 महालसा देवीचे स्थान महाराष्ट्रात नेवासे येथे आहे.


संवत्सरारम्भदिने प्रभाते सर्वे ध्वजारोपणमाद्रियन्ते । वितन्वते यत्र जनाः प्रमोदाहोलोत्सवं सद्मनि चैत्रगौर्याः 

                                                               ।।९।।

 अन्वयः यत्र सर्वे जनाः संवत्सर आरम्भदिने प्रभाते सद्यनि ध्वजारोपणम् आद्रियन्ते, प्रमोदात् चैत्रगौर्याः दोलोत्सव (च) वितन्वते ।

अर्थ : येथे सर्व लोक वर्षाच्या सुरवातीच्या दिवशी सकाळी आपापल्या घरी गुढी उभी करतात आणि आनंदाने चैत्रागौरीला बसवून तिचा उत्सव साजरा करतात.

स्पष्टीकरण: या श्लोकात चैत्र महिन्यातील १ ल्या दिवसालाच लोक आनंदाने विजयोत्सव साजरा करतात. ते घरोघरी गुढी उभारून या दिवशी श्रीराम १४ वर्षाचा वनवास संपवून अयोध्येत परत आले म्हणून लोक आनंदाने घराघरावर गुढ्या तोरणे उभारून आनंद व्यक्त करतात. घरापुढे रांगोळ्या देखील काढतात. तसेच घरात चैत्रगौर बसवून पाळण्यातही कुठे कुठे गौरीला बसवून उत्सव साजरा करतात.


पक्षे सिते भाद्रपदे च मासे गृहे गृहे यंत्र तिथौ चतुर्थ्याम् । प्रवर्तते मृण्मयमूर्तिपूजामहोत्सवः सिद्धिविनायकस्य

                                        ||१०||

अन्वयः यत्र भाद्रपदे मासे सिते पक्षे चतुथ्य तिथौ च सिद्धिविनायकस्य मृण्मयमूर्तिपूजामहोत्सवः गृहे गृहे प्रवर्तते।

 अर्थ : येथे भाद्रपद महिन्यात शुक्ल पक्षातील चतुर्थी तिथीला घरोघरी सिद्धिविनायकाची मातीची मूर्ती आणून तिचा पूजेचा उत्सव मोठ्या आनंदाने केला जातो.

 स्पष्टीकरण: चैत्र महिन्यात गुढी उभारून आनंद व्यक्त केल्यावर मोठा सण येतो तो भाद्रपद महिन्याच्या शुक्ल पक्षातील चतुर्थीला या दिवशी घरोघरी व सार्वजनिक ठिकाणी सिद्धि विनायकाची मातीची मूर्ती स्थापन करून तिचा उत्सव साजरा करतात. या उत्सवात सर्वजण जातीभेद, लहान थोर इ. सर्व विसरून सर्वजण एकत्र येतात व वैर असेल तर संपवतात.


निर्वर्त्य पूजाविधिमायुधानां नीराजनां वाजिविभूषणं च । व्रजन्ति सायं विजयादशम्यां सीमानमुलघितुमत्र लोकाः ।।११।।

अन्वयः अत्र लोका: पूजाविधिम्, आयुधानां नीराजनां वाजिविभूषणं च निर्वर्त्य विजयादशम्यां सायं सीमानम् उल्लधितुं व्रजन्ति । 

अर्थ : येथील लोक पूजाविधी शस्त्रास्त्रे व घोड्यांच्या विभूषणांनाओबाळून परत फिरून विजया दशमीस (दसऱ्याला) संध्याकाळी सीमोल्लघानासाठी जातात. येथे लोक शस्त्रांची निराजनाने पूजा करून घोड्यांना दागिन्यांनीसिद्ध करून विजयादशमीच्या दिवशी सायंकाळी सीमोल्लंघनास जातात.)

स्पष्टीकरण: महाराष्ट्रातील देवदेवतांचे वर्णन करून झाल्यावर महाकवी पंडीत वसंत शेवडे महोदयांनी येथील उत्सवांचेही वर्णन केले आहे. दसरा सणाला लोक सायंकाळी सीमोल्लंघनास जातात. वर्षाऋतू मध्ये लढाया थांबलेल्या असतात व दसन्याला सीमोलंघन करून त्या परत सुरु होतात. म्हणून आयुधे साफ करून त्यांची खंडेनवमीस वा दसऱ्याला पूजा करुन घोड्यांची ,आभूषणे ठिकठाक करून आयुधांस सर्व लोक सीमोल्लंघनास सज्ज होतात.


वृपोत्सवः श्रावणमासि यंत्र कोजागरी शारदपीर्णिमायाम् । साधानत्रिपुरस्य दाहो विशिष्यते कार्तिकपौर्णमास्याम् 

                                       ।।१२।। 

अन्वयः यत्र श्रावणमासि वृषोत्सव:, शारदपौर्णिमायां कोजागरी, कार्तिक पौर्णमास्यां सम्पद्यमानः त्रिपुरस्य दाहः विशिष्यते ।

अर्थ: येथे (महाराष्ट्रात) श्रावण महिन्यात बैलपोळा, शरद पौर्णिमा (शरद ऋतु मधील) पौर्णिमेला कोजागिरी आणि कार्तिक पौर्णिमेला त्रिपुरासुराचे दहन प्रामुख्याने होतो.

स्पष्टीकरण: श्रावण महिन्यातील 'बैलपोळा' हा सण प्रामुख्याने शेतकरी वर्गात अधिक चालतो. या दिवशी बैलांना विश्रांती देतात. औताला वा गाडीला जुंपत नाहीत. त्यांची पूजा करून त्यांना सजवून रंगवून त्यांना पुरणपोळी खाऊ घालतात. संध्याकाळी बैलांची मोठी वाजत गाजत मिरवणूक काढून हा सण साजरा केला जातो. आश्विन व कार्तिक या २ महिन्यात शरद ऋतू असतो त्या वेळी 'कोजागिरी' सण साजरा करतात. या वेळी चंद्र पूर्ण स्थितीत असतो. चंद्राची पूजा करतात. घरातल्या मोठ्या मुलाला ओवाळतात. त्याला नवीन कपडे करतात व अटीव दूध सर्व नातेवाईकांना बोलावून त्यांना पिण्यास देतात आणि कार्तिक पौर्णिमेला त्रिपुरासुराचे दहन करतात. त्याचा बेगडी पुतळा करून त्याला जाळतात.

त्रिपुर हा तारकासुरांच्या पुत्रापैकी एक आहे. यांनी ब्रह्मदेशाकडून अमेध शहरे मागून घेतली ती सोने, रूपे लोखंड यांची असून आकाश, अंतरिक्ष व पृथ्वी यावर ही अनुक्रमे होती. तिघांना मिळून ‘त्रिपुर' म्हणतात. ती असह्य झाली म्हणून शंकराने त्यांना जाळले.








Thursday, December 23, 2021

भीमघटोत्कचयो: |

                          पंचम मण्डलम् |

                 भीमघटोत्कचयो: |

                         भाषाभ्यासः ।


माध्यमभाषया ससद्धर्भ स्पष्टीकुरुत।

१) एतत् बालशौण्डीयं दृष्ट्वा अहं सौभद्रं स्मरामि ।

उत्तरः अर्थः याचे बालशौर्य पाहून मला' अभिमन्यूची आठवण येते.

 संदर्भ: प्रस्तुत संदर्भ महाकवी भास यांनी लिहिलेल्या 'मध्यमव्यायोग' या नाटकातून घेतलेल्या 'भीमघटोत्कचयोः' या नाट्य पाठातील आहे. "

स्पष्टीकरण: संस्कृत नाट्यशास्त्रात महाकवी भास यांचे नाव आदराने घेतले जाते. त्याची १३ नाटके प्रसिद्ध आहेत. यातील 'भीमघटोत्कच याची भेट कशी झाली हे नाट्यमय पद्धतीने सांगितले आहे.' वीर रसावर आधारित ही एक अंकी नाटिका वीर नायकांच्या द्वन्दू युद्धास प्राधान्य देते.

हिडींबा-भीम यांच्या बनातील विवाहानंतर ते दोघे ही बराच काळ वेगवेगळेच होते. त्या दोघांचा पुत्र घटोत्कचही आता तरुण झाला होता व पिता-पुत्रांची भेट झाली नव्हती. पांडवाच्या १२ वर्षाच्या वनवास काळात भीम परत त्याच वनात आला. तेव्हा भीम व घटोत्कच यांची भेट घडविण्यासाठी हिडिंबेने एक युक्ती केली स्वतःचा उपवास पार पाडण्यासाठी वनातून एक माणूस आणण्यास तिने घटोत्कचास सांगितले. तेव्हा त्याने एका ब्राह्मणपुत्रास धरले व त्याला नेऊ लागला. या दरम्यान भीमाने पाहिले तेव्हा त्याने ब्राह्मणपुत्रास सोडण्याची घटोत्कचास विनंती केली पण घटोत्कचाने ती अमान्य केली. त्याचा आवाज ऐकूण भीमास शंका आली की याचा आवाज माझ्या भावासारखा कसा? हा कोणी तरी शूर योद्ध्याचा मुलगा असावा 'या बालवीराचे शौर्य पाहूल मला अभिमन्युची आठवण येते असे भीम म्हणाला' .

वैशिष्ट्य : खरोखर असे दिसते की वंशातील गुण आपोआप पुढील पिढीत उतरतात. पराक्रम हा वयावर अवलंबून नसतो.




२) न मुच्यते तथाप्येष गृहीतो मातुराज्ञया ।

 अर्थः याला मी सोडणार नाही. आईच्या आज्ञेप्रमाणे मी याला पकडले आहे.

संदर्भ: प्रस्तुत संदर्भ महाकवी भास यांनी लिहिलेल्या 'मध्यमव्यायोग' या नाटकातून घेतलेल्या 'भीमघटोत्कचयोः' या नाट्य पाठातील आहे.

स्पष्टीकरणः बाह्यणपुत्रास सोडावे. अशी भीमाने घटोत्कचास विनंती केली पण त्याने ती मानली नाही. कारण तो आज्ञाधारक मुलगा होता. त्याला त्याच्या आईच्या पारण्यासाठी कोणी तरी माणूस हवा होता म्हणून आईच्या आज्ञेने त्याने त्या ब्राह्मणपुत्रास पकडले होते. माझ्या वडिलांनी जरी मला अशी आज्ञा केली असती तरी मी सोडले नसते तुमची काय कथा ?

 वैशिष्ट्य: आईच्या आज्ञेचे पालन करणे हे मुलाचे आद्यकर्तव्य यातून मुलावर योग्य ते संस्कार होतात.

वैशिष्ट्यः आईच्या आज्ञेचे पालन करणे हे मुलाचे आद्यकर्तव्य

यातून मुलावर योग्य ते संस्कार होतात.


३) अयं तु दक्षिणो बाहुरायुधं सहजं मम ।

 उत्तरः अर्थः हा माझा उजवा हात हेच माझे स्वाभाविक आयुध आहे.

संदर्भ: प्रस्तुत संदर्भ महाकवी भास यांनी लिहिलेल्या 'मध्यमव्यायोग' या नाटकातून घेतलेल्या 'भीमघटोत्कचयोः' या नाट्य पाठातील आहे.

स्पष्टीकरणः घटोत्कचाने ब्राह्मण पुत्राला धरल्यानंतर भीमाने त्याला सोडण्याची विनंती केली, पण आईची आज्ञा असल्यामुळे घटोत्कचाणे त्या बालकास सोडले नाही. भीमाने तुझ्या आईचे नाव काय? असे विचारल्यानंतर त्याने 'हिडिंबा' हे नाव सांगितले. तेव्हा त्याचे रूप, पराक्रम आणि सामर्थ्य पांडवासारखे आहे हे भीमाने ओळखले व ब्राह्मण पुत्राला सोडवून भीम स्वतः घटोत्कचा बरोबर जाऊ लागला. भीम म्हणाला, "जर तुझ्यात ताकद असेल तर मला बळाने घेऊन जा. तेव्हा घटोत्कचाने त्याला त्याचे आयुध (शस्त्र) घेण्याची विनंती केली तेव्हा भीम म्हणाला, 'हा माझा उजवा हातच माझे शस्त्र आहे.

वैशिष्ट्य: ज्या शूर वीरात स्वतःची शक्ती (बळ) सामावलेली असते त्याचे हातच त्यांचे शस्त्र असतात.


४) एतेषु कथ्यतां भद्र केन ते सदृशः पिता । 

उत्तरः अर्थः भल्या, माणसा सांग तुझे वडील त्यांच्यापैकी कोणासारखे होते ?

 संदर्भ: प्रस्तुत संदर्भ महाकवी भास यांनी लिहिलेल्या 'मध्यमव्यायोग' या नाटकातून घेतलेल्या 'भीमघटोत्कचयोः” या नाट्य पाठातील आहे. स्पष्टीकरणः भीम आणि घटोत्कच पिता पुत्र असले तरी ते एकमेकांबद्दल अनभिज्ञ होते. भीमाने घटोत्कचला विनंती केली तू या ब्राह्मण पुत्राला सोड त्या ऐवजी मी तुझ्या समवेत येतो. भीम घटोत्कचच्या मागे जात असताना घटोत्कचास म्हणाला. "तू मला पकडून जबरदस्तीने घेऊन जा" अर्थात माझ्याशी लडाई कर. घटोत्कच म्हणाला "तर मग शस्त्र धारण कर" तेव्हा भीम त्यास म्हणाला. "सुवर्णस्तम्भाप्रमाणे शत्रुचे निर्दालन करण्यास सक्षम असा माझा हा उजवा हात आहे" तेव्हा घटोत्कच म्हणाला "आपण माझे वडील भीमसेनासारखे दिसता तेव्हा भीम स्वतःची ओळख न दाखविता घटोत्कचास म्हणतो" "तूझे वडील विश्वकर्मा, शिव, कृष्ण, इन्द्र शक्तीशाली यम यापैकी कोणाच्या बरोबरीचे आहेत हे सांग"

वैशिष्ट्य : वडिलांचे सामर्थ्य व शक्ति पुत्रामध्ये अव असे म्हटले जात होते. म्हणून पूर्वी आपल्या वडीलांचे वंशाचे नाव वीर योद्धे सांगत होते.


५) अस्य पुत्रापराधस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि । 

उत्तरः अर्थः ह्या मुलाच्या अपराधाला आपण क्षमा करावी. संदर्भ: प्रस्तुत संदर्भ महाकवी भास यांनी लिहिलेल्य 'मध्यमव्यायोग' या नाटकातून घेतलेल्या 'भीमघटोत्कचयो या नाट्य पाठातील आहे.

स्पष्टीकरणः घटोत्कच आणि भीम या दोघांत युद्ध होते. घटोत्कच एक वृक्ष उपटून त्याने मारतो परंतु त्या बाराचा भीमावर कहीही परिणाम होत नाही. पुन्हा पर्वत शिखर उचलून घटोत्कच मारतो तरी ही भीमावर त्याचा कांहीही उपयोग होत नाही. तेव्हा त्या दोघांत संवाद होतो. घटोत्कच भीमाला घेऊन आपल्या घरी येतो. मी तुझे पारणे फेडण्यासाठी हा मनुष्य आणला आहे. त्याची आई भीमाला पाहून म्हणते. "हा माणूस आणलास?" अरे हे आपले दैवत आहेत. घटोत्कच म्हणतो हे दैवत कसे? तेव्हा हिडिंबा म्हणते हे तुझे वडील आहेत. घटोत्कचास् पश्चाताप होतो. तो म्हणतो मी आज्ञानामुळे आपले अभिवादन केले नाही. या पुत्राच्या अपराधास क्षमा करावी.

वैशिष्ट्य : पिता व पुत्र यांचे संबंध सहृदयतेचे असतात पुत्राने कितीही चूका केल्या तरी पिता त्याच्या त्या चुका माफच करतो.


उचितं कारणं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) भीमसेनः घटोत्कचं निग्रहीतुम् इच्छति, यतः -

अ) घटोत्कचेन भीमस्य मार्गविघ्नः कृतः । 

ब) घटोत्कचेन ब्राह्मणजनस्य मार्गविघ्नः कृतः ।

उत्तरः भीमसेनः घटोत्कचं निग्रहीतुम् इच्छति, यतः घटोत्कचेन ब्राह्मणजनस्य मार्गविघ्नः कृतः ।


२) भीम: स्वबाहुं सहजम् आयुधम् मन्यते, अ) तस्य बाहु: रिपूणां निग्रहे रतः । 

ब) भीम: आयुधात् बिभेति । यतः

उत्तरः भीमः स्वबाहुं सहजम् आयुधम् मन्यते, यतः तस्य बाहुः रिपूणा निग्रहे रतः ।

३) घटोत्कचः भीमं प्रसादं याचते, यतः -

अ) घटोत्कचः ब्राह्मणजनापराधम् अकरोत् ।

 ब) घटोत्कचेन भीमः न पूर्वम् अभिवादितः ।

उत्तरः घटोत्कचः भीमं प्रसादं याचते, यतः घटोत्कचेन भीमः न पूर्वम् अभिवादितः।

४) घटोत्कचः ब्राह्मणपुत्रं न मुञ्चति, यतः

अ) घटोत्कचः क्षुधितः अस्ति । 

ब) घटोत्कचः मातुः आज्ञां पालयितुम् इच्छति ।

उत्तरः घटोत्कचः ब्राह्मणपुत्रं न मुञ्चति, यतः घटोत्कचः मातुः आज्ञां पालयितुम् इच्छति ।


3. उचितं वाक्यांशं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) घटोत्कचस्य स्वर:- ............|

अ)राक्षसीस्वरेण सदृशः ।

ब) धनञ्जयस्वरेण सदृश: ।

उत्तरः घटोत्कचस्य स्वरः धनञ्जयस्वरेण सदृशः ।


२) घटोत्कचस्य रूपं सत्त्वं बलं चैव - ............|

) हिडिम्बायाः सदृशम् ।

ब) पाण्डवैः सदृशम् ।

उत्तरः घटोत्कचस्य रूपं सत्त्वं बलं चैव पाण्डवैः सदृशम् ।


४. उचितं शब्दं चित्वा चतुष्कोणं पूरयत ।


१) ब्राह्मणजनस्य मार्गविघ्नं कृतवान्  - घटोत्कच: |

२) बालशौण्डीर्यं दृष्टा भीमेन स्मर्यते - सौभद्रम्  (अभिमन्यु)

३) घटोत्कचेन मातुः आहारार्थम् आनीतः मानुष:- भीम: |


५. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत ।

१) घटोत्कचः कस्याः पुत्रः ? 

उत्तरः घटोत्कचः हिडिम्बायाः पुत्रः ।


२) बालशौण्डीर्यं दृष्ट्वा भीमः कं स्मरति ?

उत्तरः बालशौण्डीर्यं दृष्ट्वा भीमः सौभद्रम् (अभिमन्यूम्) स्मरति। 

३) घटोत्कचः किं किम् उत्पाट्य प्रहरति ?

उत्तरः घटोत्कचः वृक्षम् पर्वतशृङ्गम् च उत्पाट्य प्रहरति ।


४) पितृहृदयानि कीदृशानि ?

 उत्तरः पितृहृदयानि पुत्रोपेक्षीणि।


५) भीमसेनस्य दक्षिणबाहुः कीदृशः ?

उत्तरः भीमसेनस्य दक्षिणबाहुः काञ्चन स्तम्भसदृशः।


६.वाक्यं पुनर्लिखित्वा सत्यम् / असत्यं लिखत ।

१) घटोत्कचः 'मुच्यतामिति' पितुराज्ञां पालयति।

उत्तरः असत्यम्।.


२) माता किल मनुष्याणां देवतानां च न दैवतम् ।

उत्तरः असत्यम्।


७. रेखाङ्कि तं पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत ।

१) गुरुशुश्रूषुः खल्वयं तपस्वी |

 उत्तरः कथम् खल्वयं तपस्वी ?


२) हिडिम्बायाः पुत्रोऽयम् ।

उत्तरः कस्याः पुत्रोऽयम् ?


३) अस्य रूपं सत्त्वं बलं चैव पाण्डवैः सदृशम् ।

उत्तरः अस्य रूपं सत्त्वं बलं चैव कैः सदृशम् ?


४) भीमस्य दक्षिणबाहु: रिपूणा निग्रहे रतः ।

उत्तरः भीमस्य दक्षिणबाहुः केषां निग्रहे रतः ? 


५) आहारार्थम् आनीत: मानुषः ।

उत्तर: किमर्थम् आनीत: मानुष: ?

८. सर्वनामस्थाने नाम/नामस्थाने सर्वनाम प्रयुज्य वाक्यं

पुनर्लिखत ।

१) अनेन ब्राह्मणजनस्य मार्गविघ्नः कृतः। (घटोत्कच)

उत्तरः घटोत्कचेन ब्राह्मणजनस्य मार्गविघ्नः कृतः ।

२) मातु: आज्ञया एषः गृहीतः । (तद्) 

उत्तरः तस्याः आज्ञया एषः गृहीतः ।

३) अयं तु दक्षिणो बाहुरायुधं सहजं मम। (भीम)

उत्तरः अयं तु दक्षिणो बाहुरायुधं सहजं भीमस्य ।


९. विशेषण-विशेष्याणां मेलनं कुरुत ।


                अ                       

       १) दर्शनीय:                    बाहुः

       २) दक्षिण:                     तपस्वी

        ३) स्थूलम्                     पुत्रेण

         ४) पुत्रापेक्षीणि              पुरुष:

         ५) गुरुशुश्रूषः                पितृहृदयानि

                                           वृक्षम्

उत्तर :-

               अ                            आ

     १) दर्शनीयः                       पुरुष:

     २) दक्षिण:                         बाहुः

     ३) स्थूलम्                         वृक्षम्

     ४) पुत्रापेक्षीणि                  पितृहृदयानि

     ५) गुरुशुश्रूषुः                    तपस्वी


११. पृथक्करणं कुरुत ।

(अ) क्रमेण योजयित्वा वाक्यानि पुनर्लिखत

अ) १) भीमेन सौभद्रस्य स्मरणम्।

      २) घटोत्कचस्य शौण्डीर्यप्रदर्शनम् ।

       ३) भीमेन घटोत्कचस्वरस्य श्रवणम् ।

       ४) भीमेन धनञ्जयस्वरस्य स्मरणम्। 

उत्तरः -

१) भीमेन घटोत्कचस्वरस्य श्रवणम्। 

२)भीमेन धनञ्जयस्वरस्य स्मरणम्।

३)घटोत्कचस्य शौण्डीर्यप्रदर्शनम् ।

४) भीमेन सौभद्रस्य स्मरणम् । 


ब) १) घटोत्कचेन मातृनामकथनम् । 

२) भीमेन स्वपुत्रस्य घटोत्कचस्य अभिज्ञानम्। 

३) घटोत्कचः बन्धुरिव इति भीमस्य चिन्तनम्। 

४) भीमेन घटोत्कचस्य स्वरस्य श्रवणम् ।

उत्तरः -

१) भीमेन घटोत्कचस्य स्वरस्य श्रवणम्।

२) घटोत्कचः बन्धुरिव इति भीमस्य चिन्तनम्। 

३) घटोत्कचेन मातृनामकथनम्। 

४) भीमेन स्वपुत्रस्य घटोत्कचस्य अभिज्ञानम्।


क) १) भीमस्य घटोत्कचानुगमनाय सिद्धता । 

२) भीमद्वारा स्ववाहो: आयुधरूपेण वर्णनम् ।

 ३) भीमद्वारा ब्राह्मणपुत्रस्य मोचनम् । 

४) घटोत्कचद्वारा वृक्षम् उत्पाट्य प्रहरणम्

उत्तरः -

१)  भीमद्वारा ब्राह्मणपुत्रस्य मोचनम् ।

२) भीमस्य घटोत्कचानुगमनाय सिद्धता ।

३) भीमद्वारा स्वबाहो: आयुधरूपेण वर्णनम् । 

४) घटोत्कचद्वारा वृक्षम् उत्पाठ्य प्रहरणम् । 


ड) १) घटोत्कचेन भीमस्य पितृरूपेण अभिज्ञानम्

२) हिडिम्बाभीमयोः सम्मुखीभवनम् ।

३) घटोत्कचद्वारा भीमस्य प्रहरणम् । 

४) घटोत्कचेन भीमं प्रति प्रसादयाचनम् ।

उत्तरः -

१) घटोत्कचद्वारा भीमस्य प्रहरणम् । 

२) हिडिम्बाभीमयोः सम्मुखीभवनम् । 

३) घटोत्कचेन भीमस्य पितृरूपेण अभिज्ञानम्।

४) घटोत्कचेन भीमं प्रति प्रसादयाचनम् |



















Friday, December 10, 2021

मैं उद्घोषक


                            मैं उद्घोषक

                               लेखक :-आनंद प्रकाश सिंह


स्वाध्याय :- (पाठ्य पुस्तक युवकभारती कक्षा बारहवीं.                     के आधार पर  )

प्रश्न १)  -सूत्र संचालक के कारण कार्यक्रम में चार चाँद लगते               हैं।' इसे स्पष्ट कीजिए |

उत्तर :- आज के जमाने में सूत्रसंचालक का महत्व बहुत बढ़ गया है। सूत्र संचालक किसी भी कार्यक्रम का कर्मधार होता है। सूत्रसंचालक कार्यक्रम में शोभा लाता है |कार्यक्रम छोटा हो या बड़ा हो सूत्रसंचालक अपनी प्रतिभाशक्ति के बल पर कार्यक्रम में चार चाँद लगा देता है। 

सूत्र संचालक अपनी भाषा ,आवाज में उतार-चढ़ाव ,अपनी हाजिरजवाबी, श्रोताओं से चुटीले संवादों, संचालन के बीच- बीच में सरसता लाने के लिए चुटकुलों, रोचक घटनाओं के प्रयोग, मंच पर उपस्थित महानुभावों के प्रति अपने सम्मान सूचक शब्दों के प्रयोग, कार्यक्रमों के अनुसार भाषा शैली  में परिवर्तन करने या अपनी गलती पर माफी माँग लेने आदि गुणों के कारण सूत्र संचालन में चार चाँद लगा ही देता है। 

सूत्र संचालक अपनी प्रतिभा शक्ति के कारण  उपस्थित जन-समुदाय की प्रशंसा का पात्र भी बन जाता है। सूत्र संचालक अपने मिलनसार व्यक्तित्व, अपने विविध विषयों के ज्ञान, कार्यक्रम के सुचारू संचालन ,अपनी अध्ययनशीलता, अपनी प्रभावशाली और मधुर आवाज के संतुलित प्रयोग आदि के बल पर कार्यक्रम में जान डाल देता है।

सूत्र संचालक मे सतर्कता, सहजता और उत्साह वर्धन यह मुख्य  गुण होते हैं। सूत्र संचालक के द्वारा कार्यक्रम के बीच-बीच में प्रसंगानुसार चुटकुले पद्य काव्यपंक्तियाँ विषयक संबंधित जानकारी देने से श्रोता ध्यान लगाकर सुनते हैं और कार्यक्रम रोचक होता है। उत्तम सूत्र संचालक की प्रतिभा का लाभ कार्यक्रमों और उनके आयोजकों को मिलता है। इस प्रकार उत्तम सूत्र संचालक के कारण कार्यक्रम में चार चाँद लग जाते हैं।


प्रश्न २)  उत्तम मंच संचालक बनने के लिए आवश्यक गुण विस्तार से लिखिए।

 उत्तर- किसी भी कार्यक्रम में मंच संचालक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। मंच संचालन करना एक कला है। अच्छा मंच संचालक अपनी प्रतिभाशक्ति के कारण कार्यक्रम को रोचक बना देता है। उत्तम मंच संचालक कार्यक्रम में जान डाल देता है। मंच संचालक श्रोता और वक्ता को जोड़ने वाली कड़ी होता है। वही सभा की शुरुआत करता है। उत्तम मंच संचालक बनने के लिए संचालक को अच्छी तैयारी करनी पड़ती है। मंच संचालक को जिस तरह का कार्यक्रम हो, उसी तरह की तैयारी भी करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कार्यक्रम की संहिता लेखन करना चाहिए|

 मंच संचालक के लिए विविध विषयों का ज्ञान होना चाहिए। मंचसंचालक व्यक्तिमत्व प्रभावशाली होना चाहिए और वह हँसमुख, हाजिर जवाबी तथा विविध विषयों का ज्ञाता भी होना चाहिए। इसके अतिरिक्त भाषा पर उसका प्रभुत्व होना अति आवश्यक है। मंच संचालक को किसी कार्यक्रम में ऐन वक्त पर परिवर्तन होने पर संहिता में परिवर्तन कर संचालन करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाना पड़ता है। ऐसी क्षमता मंच संचालक में होनी चाहिए। अच्छे मंच संचालक को हर प्रकार के साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है।

मंच संचालक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कार्यक्रम कोई भी हो, मंच की गरिमा बनी रहनी चाहिए। सबसे - पहले मंच संचालक श्रोताओं के सामने आता है; इसलिए उसका परिधान, वेशभूषा आदि सहज और गरिमामय होनी चाहिए।

उत्तम मंच संचालक के अंदर आत्मविश्वास, सतर्कता, सहजता के साथ ओताओं का उत्साह बढ़ाने का गुण होना आवश्यक है। इसके अलवा मंच संचालक में समयानुकूल छोटे छोटे चुटकुलों तथा रोचक घटनाओं से ओताओं को बाँध रखने की शक्ति भी जरूरी है। अच्छे मंच संचालक को भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना


आवश्यक है। भाषाकी शुद्धता, शब्दों का चयन, शब्दों का उचित


प्रयोग तथा किसी प्रख्यात साहित्यकार के कथन का उल्लेख कार्यक्रम को प्रभावशाली एवं हृदयस्पर्शी बना देता है। यही उत्तम मंच संचालक की थाती होती है! उत्तम मंच संचालक बननेवाले व्यक्ति को उपर्युक्त गुणों को आत्मसात करना आवश्यक है!






कार्यक्रमों तथा समारोहों की सफलता या असफलता की सारी जिम्मेदारी सूत्र संचालक की होती है। सूत्र संचालक का कार्य विविधतापूर्ण होता है। आजकाल शादी-विवाह में संगीत संध्या कार्यक्रम, बर्थडे पार्टी, शादी की वर्षगाँठ कार्यक्रम, विदाई समारोह, शासकीय कार्यक्रम, राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा दूरदर्शन पर आयोजित परिचर्चा, आकाशवाणी पर होनेवाली चर्चाओं में सूत्र संचालक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शासकीय तथा राजनैतिक कार्यक्रमों में सूत्र संचालक को पद, गरिमा वरिष्ठता तथा प्रोटोकॉल का ध्यान देना पड़ता है। वहीं पर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होनेवाली बहस, परिचर्चा में कार्यक्रम की संपूर्ण जानकारी एवं विषय की गंभीरता का ज्ञान होना चाहिए। संगीत संध्या, जन्मदिन पार्टी, वैवाहिक वर्षगाँठ समारोह तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में संचालक की वाक्पटुता, हाजिर जवाबी, हास्य-व्यंग्य तथा शेर एवं काव्य पाठ्य समारोह में चार चाँद लगा देती है। कार्यक्रम की रोचकता एवं सरसता का संपूर्ण दायित्व सूत्रसंचालक के ऊपर निर्भर करता है। सूत्र संचालक श्रोताओं और मंच के बीच कड़ी का काम करता है। एक तरफ जहाँ पर मंच पर उपस्थित श्रेष्ठजनों की क्रमवार वरिष्ठता एवं लोकप्रियता का ध्यान रखना पड़ता है वहीं दूसरी तरफ श्रोताओं की कार्यक्रम में रूवि बनाए रखने के प्रति संचालक की महती जिम्मेदारी होती है।


अथवा


(6 अंक)








Tuesday, December 7, 2021

उषा की दीपावली

                 हिंदी युवकभारती 

                  कक्षा ग्यारहवीं

                     २. लघुकथाएँ


                                     लेखक - श्रीमती संतोष श्रीवास्तव

लेखक परिचय : संतोष श्रीवास्तव जी का जन्म २३ नवंबर १९५२ को मंडला (मध्य प्रदेश) में हुआ। आपने एम.ए. | (इतिहास, हिंदी), बी.एड तथा पत्रकारिता की उपाधियाँ प्राप्त की। नारी जागरूकता और उसकी अस्मिता की पहचान | आपकी लेखनी के विषय हैं। आपकी रचनाओं में एक ओर वर्तमान स्थितियों तथा सामाजिक विसंगतियों का चित्रण दृष्टिगोचर होता है तो वहीं दूसरी ओर जीवन जीने की छटपटाहट और परिस्थितियों से लड़ने की सार्थक सोच भी है।

 प्रमुख कृतियाँ : 'बहके बसंत तुम', 'बहते ग्लेशियर' (कहानी संग्रह) 'दबे पाँव प्यार', 'टेम्स की सरगम', 'ख्वाबों के पैरहन'(उपन्यास), 'फागुन का मन' (ललित निबंध संग्रह), 'नीली पत्तियों की शायराना हरारत' (यात्रा संस्मरण) आदि। | विधा परिचय: 'लघुकथा' हिंदी साहित्य में प्रचलित विधा है। यह गद्य की ऐसी विधा है जो आकार में लघु है पर कथा के तत्त्वों से परिपूर्ण है। कम शब्दों में जीवन की संवेदना, पीड़ा, आनंद को सघनता तथा गहराई से प्रस्तुत करने की क्षमता इसमें होती है। किसी परिस्थिति या घटना को लेखक अपनी कल्पना का पुट देकर रचता है। हिंदी साहित्य में डॉ. कमल किशोर | गोयनका, डॉ. सतीश दुबे, संतोष सुपेकर और कमल चोपड़ा आदि प्रमुख लघुकथाकार हैं। 

पाठ परिचय: उषा की दीपावली' लघुकथा अनाज की बरबादी पर बालमन की संवेदनशीलता और संस्कारों को जाग्रत कराती है। एक ओर थालियाँ भर-भरकर जूठन छोड़ने वाले लोग हैं तो दूसरी ओर अनाज के एक-एक कौर को तरसते और विभिन्न तरीकों से रोटी का जुगाड़ करते लोग हैं। 'मुस्कुराती चोट' लघुकथा आर्थिक अभाव के कारण पढ़ाई न कर पाने की | विवशता तथा मजदूरी करके अपनी पढ़ाई जारी रखने की अदम्य इच्छा को दर्शाती है। यह बाल मजदूरी जैसी समस्या को इंगित करते हुए होसला देती, आशाबाद को बढ़ाती सकारात्मक और संवेदनशील लघुकथा है।

                                लघुकथा 

                          उषा की दीपावली

दादी ने नरक चौदस के दिन आटे के दीप बनाकर मुख्य द्वार से लेकर हर कमरे की देहरी जगमगा दी थी। घर पकवान की खुशबू से तरबतर था। गुझिया, पपड़ी, चकली आदि सब कुछ था। मगर दस वर्षीय उषा को तो चॉकलेट और बंगाली मिठाइयाँ ही पसंद थीं। दादी कहती हैं कि "तेरे लिए तेरी पसंद की मिठाई ही आएगी। यह सब तो पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों, घर आए मेहमानों के लिए हैं।"

आटे के दीपक कंपाउंड की मुंडेर पर जलकर सुबह तक बुझ गए थे। उषा जॉगिंग के लिए फ्लैट से नीचे उतरी तो उसने देखा पूरा कंपाउंड पटाखों के कचरे से भरा हुआ था। उसने देखा, सफाई करने वाला बबन उन दीपों को कचरे के डिब्बे में न डाल अपनी जेब में रख रहा था। कृशकाय बबन कंपाउंड में झाडू लगाते हुए हर रोज उसे सलाम करता था। "तुमने दीपक जेब में क्यों रख लिए ?" उषा ने पूछा। “घर जाकर अच्छे से सेंककर खा लेंगे, अन्न देवता हैं न।" बबन ने खीसे निपोरे।

उषा की आँखें विस्मय से भर उठीं। तमाम दावतों में भरी प्लेटों में से जरा-सा दूँगने वाले मेहमान और कचरे केडिब्बे के हवाले प्लेटों का अंबार उसकी आँखों में सैलाब बनकर उमड़ आया। वह दौड़ती हुई घर गई। जल्दी-जल्दी पकवानों से थैली भरी और दौड़ती हुई एक साँस में सीढ़ियाँ उतर गई... अब वह थी और बबन की काँपती हथेलियों पर पकवान की थैली। उषा की आँखों में हजारों दीप जल उठे और पकवानों की थैली देख बबन की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए ।

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पाठ्य पुस्तक में दिए गए स्वाध्याय:-👇

 शब्दार्थ :

कृशकाय = दुबला-पतला शरीर

तरबतर = गीला, भीगा

बेरहमी = निर्दयता, दयाहीनता


आकलन


१) लिखिए :

(अ) दावत में होने वाली अन्न की बरबादी पर उषा की प्रतिक्रिया --

उत्तर - दावतों में मेहमान प्लेट भर-भर कर खाना लेते हैं और जरा-जरा सा दूँग कर जूठे खाने से भरी प्लेट कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। दूसरी ओर अनेक ऐसे लोग हैं, जो दानेदाने के लिए तरसते हैं और वे भूखे-पेट सो जाते हैं। यह सोच कर उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।


(आ) संवादों का उचित घटनाक्रम-

(१) “रुपये खर्च हो गए मालिक"

(२) "स्कूल नहीं जाता तू? अजीब है...!"

(३) “अरे क्या हुआ! जाता क्यों नहीं?" "

(४) “माँ, बाल मजदूरी अपराध है न?"

उत्तर :-संवादों का उचित कर्म निम्नलिखित प्रकार से है:-

(1) "स्कूल नहीं जाता तू? अजीब है...! " 

(2) "माँ, बाल मजदूरी अपराध है न?"

(3) "अरे क्या हुआ! जाता क्यों नहीं?

(4) "रुपए खर्च हो गए मालिक।'


शब्द संपदा :-

समूह में से विसंगति दशनिवाला कृदंत/तद्धित शब्द चुनकर लिखिए :-


(१) मानवता, हिंदुस्तानी, ईमानदारी, पढ़ाई

उत्तर :- पढ़ाई :- (पढ़ + आई - कृत प्रत्यय) -  कृदंत

(२) थकान, लिखावट, सरकारी, मुस्कुराहट

उत्तर :-सरकारी: (सरकार + ई - तद्धित प्रत्यय)तद्धित

(३) बुढ़ापा, पितृत्व, हँसी, आतिथ्य

उत्तर :- हँसी:-(हँस + ई - कृत प्रत्यय) कृदंत

(४) कमाई, अच्छाई, सिलाई, चढ़ाई

उत्तर :- अच्छाई:- (अच्छा + आई- तद्धित प्रत्यय) तद्धित

(आ) निम्नलिखित वाक्यों में आए हुए शब्दों के वचन परिवर्तन करके वाक्य फिर से लिखिए  :-


(१) पेड़ पर सुंदर फूल खिला है।

उत्तर :- पेड़ों पर सुंदर फूल खिले हैं।

 (२) कला के बारे में उनकी भावना उदात्त थी।

उत्तर :- कलाओं के बारे में उनकी भावना उदात्त थी।

(३) दीवारों पर टँगे हुए विशाल चित्र देखे ।

उत्तर :- दीवार पर टँगा हुआ विशाल चित्र देखा।

(४) वे बहुत प्रसन्न हो जाते थे।

उत्तर :- वह बहुत प्रसन्न हो जाता था।

(५) हमारी तुम्हारी तरह इनमें जड़ें नहीं होतीं।

उत्तर :- मेरी-तुम्हारी तरह इसमें जड़ नहीं होती।

(६) ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे।

उत्तर :- यह आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहा.            था।

 (७) वह कोई बनावटी सतह की चीज है|

उत्तर :- वे कोई बनावटी सतह की चीजें हैं।






Wednesday, December 1, 2021

प्राचीनकाले प्रसाधनम्

                       तृतीय मंडलम्

                        द्वितीय: पाठ: |

                   प्राचीनकाले प्रसाधनम्


भाषाभ्यासः ।


.माध्यमभाषया सन्दर्भ स्पष्टीकुरुत।ह

१) तदर्थं विविधप्रसाधनसाहित्यस्य प्रभूतम् उपयोजनं भारतीयाः

     कृतवन्तः ।

उत्तरः अर्थः त्यासाठी निरनिराळ्या प्रसाधन साहित्याचा वापर ● भारतीयांनी मोठ्या प्रमाणात केला.

संदर्भ : - प्रस्तूत संदर्भ 'संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांची सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे.

स्पष्टीकरण :- हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील : आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा वेरूळ गुहातून तसेच चित्रकलांमधून लोक प्रसाधने वापरलेले दिसतात. महाभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

प्रसाधन हे मानवी जीवनाचे महत्त्वपूर्ण अंग आहे. फार पूर्वीपासून स्त्री पुरुषांना प्रसाधन कला अवगत होती असे दिसते वेद, ऋतुसंहार मेघदूत, बृहत्संहिता, मानसोल्लास या संस्कृत प्राकृत काव्यांमधून देखील प्रसाधनांचे बरेच संदर्भ मिळतात. प्राचीन काळात सौंदर्यस्पर्धा पण घेतल्या जात होत्या. उत्खननात प्राचीन प्रसाधनसाधने मिळाली. यावरून असे लक्षात येते की प्राचीन काळापासून केवळ स्त्रियांनाच नाही तर पुरुषांना सुद्धा प्रसाधनकला अवगत होती. त्यासाठी निरनिराळे प्रसाधन साहित्य भारतीयांनी भरपूर प्रमाणात वापरले.

वैशिष्ट्यः- भारतात प्राचीन काळापासून स्त्री आणि पुरुष स्वतःचे • सौंदर्य वाढविण्यासाठी अनेक प्रकारच्या प्रसाधनांचा वापर करीत होते.


२) प्रसाधनस्य द्वौ विभागौ।

 उत्तरः अर्थः- प्रसाधनाचे दोन विभाग आहेत.

संदर्भ :- प्रस्तूत संदर्भ 'संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांच्या सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे. स्पष्टीकरण हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा 'वेरूळ तसेच चित्रकलांमधून त्याकाळी लोक प्रसाधने वापरताना दिसतात. महाभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

प्रसाधनांची १६ अंगे आहेत. प्रसाधनाचे दोन विभाग आहेत. पहिले आंतरिक प्रसाधन तसेच दुसरे बाह्यप्रसाधन! शरीराचे -'निरोगित्व' हे आंतरिक प्रसाधन आहे. उचित आहार, निद्रा, जलपान व्यायाम ही आंतरिक प्रसाधने आहेत. बाह्य प्रसाधनात दन्तधावन (दात घासणे), केश सम्मार्जन, स्नान, विलेपन इ. येते. स्नानासाठी साबण, वनौषधीयुक्त चूर्णे वापरली जातात. विलेपनाने त्वचा मऊ मुलायम होते. दुर्गंध नष्ट होतो.

वैशिष्ट्यः- प्रसाधन हे दोन प्रकारचे असते. केवळ चेहऱ्यावर क्रीम, पावडर लावून चालत नाही तर आतून निरोगी राहणेसुद्धा महत्त्वाचे असते.


३) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् ।

 उत्तरः अर्थः- ऋतुला अनुसरून प्रसाधन करावे.

संदर्भ:- प्रस्तूत संदर्भ संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या उ "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांची सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे.

स्पष्टीकरण :- हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा वेरूळ तसेच चित्रकलांमधून लोक प्रसाधने वापरत असत असे दिसते.महांभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

ऋतुप्रमाणे प्रसाधन करावे. उन्हाळ्यात चंदनाचा लेप द्यावा, सुती कपडे वापरावेत, मोत्याच्या माळा घालाव्यात तर थंडीच्या ऋतुत लोकरी कपडे घालावेत, चंदनाची धुरी घ्यावी, केशर वापरावे. केशसंवर्धनासाठी ब्राह्मी, आवळा, माका या वनौषधींची तेल वापरावे. केसांना धूपन केल्यामुळे घाम व ऊवा निघून जातात. फुले, मोती इत्यादीच्या, माळांनी केस सजवावेत. मुखाच्या सौदर्यासाठी हळद व मध याचे मिश्रण मुखास लावावे. लोध फुलांच्या परागाच्या चूर्णाने मुखाचे तेज वाढते व शोभते. अंगाला सुवासिक द्रव्याची उटी लावावी. विड्याने ओठ रंगावावेत काजळाच्या काडीने डोळ्यांना सुशोभित करावे. नखे रंगवावीत गालांना सुवासिक उटी लावावी. वैशिष्ट्य : वर्षभर एकाच प्रकारची प्रसाधने किंवा क्रीम, पावडर लावू नयेत. ऋतुनुसार आणि आपल्या त्वचेला हितकारक अशी प्रसाधने वापरावीत.


२. उचितं कारणं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) प्राय: सर्वे जनाः प्रसाधनं कुर्वन्ति, यतः .....|

अ) जनाः प्रसाधनप्रियाः ।

आ) प्रसाधनैः विना जीवितुं न शक्यते ।

उत्तर :-प्राय: सर्वे जनाः प्रसाधनं कुर्वन्ति, यतः  जनाः प्रसाधनप्रियाः ।


२) ऋतुम् अनुसृत्य एव प्रसाधनं क्रियते, यतः .....|

अ) ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं कर्तुं न शक्यते । 

आ) ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं हिताय न भवति ।

उत्तर :- ऋतुम् अनुसृत्य एव प्रसाधनं क्रियते, यतः ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं हिताय न भवति ।


३) केशधूपनं काले काले कर्तव्यम्, यतः ... । 

अ) केशधूपनेन विना प्रसाधनं न शोभते ।

आ) केशधूपनेन स्वेदयूकादयः नश्यन्ति ।

उत्तर:-३) केशधूपनं काले काले कर्तव्यम्, यतः  केशधूपनेन स्वेदयूकादयः नश्यन्ति ।


३. उचितं वाक्यांशं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) उचिताहार-निद्रा-जलपान-व्यायामादिकैः - ...

अ) बाह्यप्रसाधनं साध्यम् । 

ब) आन्तरिकप्रसाधनं साध्यम् ।

उत्तर:- उचिताहार-निद्रा-जलपान-व्यायामादिकैः..                             आन्तरिकप्रसाधनं साध्यम्  । 

२) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनम् -

 अ) ग्रीष्मकाले कृष्णागरुधूपनं शिशिरकाले चन्दनविलेपनम् |

ब) ग्रीष्मकाले चन्दनविलेपनम्, शिशिरकाले कृष्णागरुधूपनम् ।

उत्तर:- ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनम् - ग्रीष्मकाले                                चन्दनविलेपनम्, शिशिरकाले कृष्णागरुधूपनम् ।

३) प्राचीनप्रसाधनानां विशेषः यत् तत्र 

अ) कृतकानां रसायनबहुलानां प्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।

ब) नैसर्गिकप्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।

उत्तर:- प्राचीनप्रसाधनानां विशेषः यत् तत्र:- नैसर्गिकप्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।


४. उचितं शब्दं चित्वा चतुष्कोणं पूरयत।

१) सुविदितानां कलानां सङङ्ख्या = चतुष्षट्टिकला |

२) प्राचीनकाले आयुज्यमाना एका सौन्दर्यस्पर्धा = जनपद.                       कल्याणी /नगर सौभिनी |

३) प्रसाधनकलायाः षोडश-अङ्गेषु एकम् = मर्दनम् |

४) एकं बाह्यप्रसाधनम् = दंतधावनम् |

५) एक: केशरचनाविशेषः =चुडावेणी |

 ६) प्रसाधनस्य परमोत्कर्षः = भूषणविन्यास |

७) गाहासत्तसई वर्णिता = प्रसाधनकला |

८) वनौषधियुतैः चूर्णकैः विलेपनेन मृदुतरा भवति = त्वक् ।


५. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।

१) प्रसाधनकला केषु काव्येषु वर्णिता अस्ति?

उत्तरः प्रसाधनकला वेदादिषु ऋतुसंहार मेघदूत वर्णिता अस्ति। 

२) प्रसाधनकलाया: कति अङ्गानि सन्ति ?

उत्तर: प्रसाधनकलायाः षोड्श अङ्गानि सन्ति । 

३) केशसंवर्धनस्य कृते किम् आवश्यकम् ?

उत्तर: केशसंवर्धनस्य कृते तेलेन शिरोमर्दनम् आवश्यकम्। 

४) केशधूपनेन किं भवति?

उत्तर: केशधूपनेन स्वेदयूकादीनां नाशः भवति।

५) मुखे केन गौरकान्तिः शोभते ?

उत्तरः मुखे हरिद्रामधुमिश्रितेन लेपेन गौरकान्तिः शोभते।

६) केन ओष्ठौ रञ्जनीयौ ?

उत्तर: सिक्थयुक्तेन आलक्तकेन वा ताम्बुलेन ओष्ठौ रञ्जनीयौ।

७) करचरणाः कथं प्रसाधनीयाः ?

उत्तर: करचरणा: आलक्तकेन प्रसाधनीयाः। 

८) हर्षचरिते के पटभेदाः निरूपिताः ?

उत्तरः हर्षचरिते बाणकविना दुकूल- कौशेय चीनांशुक -                    क्षौमादय पटभेदाः निरूपिताः ।

९) प्राचीनप्रसाधनविषये कः विशेषः लक्षणीयः ? 

उत्तरः प्राचीनप्रसाधनविषये नैसर्गिकतया उपलब्धानां.                       प्रसाधनानां प्राचर्युम् इति लक्षणीयः ।


६. वाक्यं पुनर्लिखित्वा सत्यम्/असत्यं लिखत ।

१) प्रसाधनं नाम मानवजीवनस्य महत्त्वपूर्णम् अङ्गम् |

उत्तर - सत्यम्

२) प्रसाधनकलायाः चतुष्षष्टिः अङ्गानि सन्ति ।

उत्तर - असत्यम्

३) मुखसौन्दर्यस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धा ।

   उत्तर - सत्यम्

 ४) प्रसाधनस्य परमोत्कर्षः नाम केशसंवर्धनम् ।

       उत्तर - असत्यम्

७. रेखाङ्कितं पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत ।

१) चित्रशिल्पेषु नैकविधाः प्रसाधनपराः जनाः दृश्यन्ते।

उत्तरः केष नैकविधाः प्रसाधनपराः जनाः दृश्यन्ते ?

२) प्रसाधनकलायाः षोडशः अङ्गानि सन्ति ।

उत्तरः प्रसाधनकलायाः कति अङ्गानि सन्ति ?

३) शिशिरे ऊर्णावस्त्रं कृष्णागुरुधूपनं तथा कुड्कुममण्डनम् 

उत्तरः कदा ऊर्णावस्त्रं कृष्णागुरुधूपनं तथा कुङ्कुममण्डनम् ?

४) विलेपनेन त्वक् उज्वला मृदुतरा च भवति ।

उत्तरः केन त्वक् उज्वला मृदुतरा च भवति ?

५) मुखसौन्दर्यस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धाः । 

 उत्तरः कस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धाः ?

६) उत्खननेषु प्राचीनानि प्रसाधनसाधनानि प्राप्तानि |

उत्तरः केष प्राचीना नि प्रसाधनसाधनानि प्राप्तानि ?


सर्वनामस्थाने नाम / नामस्थाने सर्वनाम प्रयुज्य वाक्यं पुनर्लिखत ।


१) वेदपूर्वकालादेव न केवलं स्त्रियः किन्तु पुरुषाः अपि प्रसाधनकलायां निपुणाः |( तद्) 

उत्तरः वेदपूर्वकालादेव न केवलं स्त्रियः किन्तु पुरुषाः अपि तस्याम्  |

२) तासु प्रसाधनविषयकाः नैका कला: निर्दिष्टाः । (चतुष्पष्टिकला)

उत्तर: चतुष्पष्टिकलासु प्रसाधनविषयकाः नैकाः कलाः निर्दिष्टाः ।

३) प्रसाधनस्य द्वौ विभागौ-आन्तरिकप्रसाधनं तथा बाह्यप्रसाधनम् । (तद्)

उत्तरः तस्य द्वौ विभागौ-आन्तरिकप्रसाधनं तथा बाह्यप्रसाधनम्।

४) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् इति सूचितम् । (एतद्)

उत्तरः एतम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् इति सूचितम् ।

 ५) कज्जलशलाकया तयोः अलङ्करणं कर्तव्यम्। (नेत्र)

उत्तर: कज्जलशलाकया नेत्रयोः अलङ्करणं कर्तव्यम् ।





उत्तर :-




२) 


उत्तर :-


   



Saturday, November 27, 2021

पेड़ होने का अर्थ ( कवि डॉ. मुकेश गौतम)

           

                      पेड़ होने का अर्थ

कवि- डॉ. गौतम मुकेश 

Wednesday, November 17, 2021

पाप के चार हथियार

                   पाप के चार हथियार 

                         लेखक :- कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर '