पिता
है पिता चिंतित कर्ण के लिए,
और एक पिता भी चिंतित है अर्जुन के लिए|
चिंतित सूर्यदेव आज नहीं देना चाहते दर्शन ,
जानते हैं वे कि इसी में है कर्ण का रक्षण |
हो अगर सूर्य उदय ; छल द्वार पर आएगा ,
पुत्र अर्जुन की खातिर स्वयं पर लांछन लगवाऐगा |
दोनों देव हैं, दोनों देवता के प्रसाद हैं,
पर जीतेगा वही जिसके दीनानाथ है|
सब अलग होता गर भाई-भाई मिल जाते ,
ऐसे पुत्रों को प्राप्त कर पिता गर्व से हर्षाते |
पर पिता की विडंबना कौन समझ पाया है ?
उसने तो सामने कठोर और अकेले में आंसू बहाया है |
कहते हैं ,माता ही ममता की मूरत होती है,
पर पिता को भी बच्चों की चिंता होती है|
मां के आंसू को सबने जाना है ,
पर क्या पिता की घुटन को किसी ने पहचाना है ?
-प्रा. पायल जायसवाल
बढ़िया 👌👍
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