Friday, December 10, 2021

मैं उद्घोषक


                            मैं उद्घोषक

                               लेखक :-आनंद प्रकाश सिंह


स्वाध्याय :- (पाठ्य पुस्तक युवकभारती कक्षा बारहवीं.                     के आधार पर  )

प्रश्न १)  -सूत्र संचालक के कारण कार्यक्रम में चार चाँद लगते               हैं।' इसे स्पष्ट कीजिए |

उत्तर :- आज के जमाने में सूत्रसंचालक का महत्व बहुत बढ़ गया है। सूत्र संचालक किसी भी कार्यक्रम का कर्मधार होता है। सूत्रसंचालक कार्यक्रम में शोभा लाता है |कार्यक्रम छोटा हो या बड़ा हो सूत्रसंचालक अपनी प्रतिभाशक्ति के बल पर कार्यक्रम में चार चाँद लगा देता है। 

सूत्र संचालक अपनी भाषा ,आवाज में उतार-चढ़ाव ,अपनी हाजिरजवाबी, श्रोताओं से चुटीले संवादों, संचालन के बीच- बीच में सरसता लाने के लिए चुटकुलों, रोचक घटनाओं के प्रयोग, मंच पर उपस्थित महानुभावों के प्रति अपने सम्मान सूचक शब्दों के प्रयोग, कार्यक्रमों के अनुसार भाषा शैली  में परिवर्तन करने या अपनी गलती पर माफी माँग लेने आदि गुणों के कारण सूत्र संचालन में चार चाँद लगा ही देता है। 

सूत्र संचालक अपनी प्रतिभा शक्ति के कारण  उपस्थित जन-समुदाय की प्रशंसा का पात्र भी बन जाता है। सूत्र संचालक अपने मिलनसार व्यक्तित्व, अपने विविध विषयों के ज्ञान, कार्यक्रम के सुचारू संचालन ,अपनी अध्ययनशीलता, अपनी प्रभावशाली और मधुर आवाज के संतुलित प्रयोग आदि के बल पर कार्यक्रम में जान डाल देता है।

सूत्र संचालक मे सतर्कता, सहजता और उत्साह वर्धन यह मुख्य  गुण होते हैं। सूत्र संचालक के द्वारा कार्यक्रम के बीच-बीच में प्रसंगानुसार चुटकुले पद्य काव्यपंक्तियाँ विषयक संबंधित जानकारी देने से श्रोता ध्यान लगाकर सुनते हैं और कार्यक्रम रोचक होता है। उत्तम सूत्र संचालक की प्रतिभा का लाभ कार्यक्रमों और उनके आयोजकों को मिलता है। इस प्रकार उत्तम सूत्र संचालक के कारण कार्यक्रम में चार चाँद लग जाते हैं।


प्रश्न २)  उत्तम मंच संचालक बनने के लिए आवश्यक गुण विस्तार से लिखिए।

 उत्तर- किसी भी कार्यक्रम में मंच संचालक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। मंच संचालन करना एक कला है। अच्छा मंच संचालक अपनी प्रतिभाशक्ति के कारण कार्यक्रम को रोचक बना देता है। उत्तम मंच संचालक कार्यक्रम में जान डाल देता है। मंच संचालक श्रोता और वक्ता को जोड़ने वाली कड़ी होता है। वही सभा की शुरुआत करता है। उत्तम मंच संचालक बनने के लिए संचालक को अच्छी तैयारी करनी पड़ती है। मंच संचालक को जिस तरह का कार्यक्रम हो, उसी तरह की तैयारी भी करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कार्यक्रम की संहिता लेखन करना चाहिए|

 मंच संचालक के लिए विविध विषयों का ज्ञान होना चाहिए। मंचसंचालक व्यक्तिमत्व प्रभावशाली होना चाहिए और वह हँसमुख, हाजिर जवाबी तथा विविध विषयों का ज्ञाता भी होना चाहिए। इसके अतिरिक्त भाषा पर उसका प्रभुत्व होना अति आवश्यक है। मंच संचालक को किसी कार्यक्रम में ऐन वक्त पर परिवर्तन होने पर संहिता में परिवर्तन कर संचालन करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाना पड़ता है। ऐसी क्षमता मंच संचालक में होनी चाहिए। अच्छे मंच संचालक को हर प्रकार के साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है।

मंच संचालक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कार्यक्रम कोई भी हो, मंच की गरिमा बनी रहनी चाहिए। सबसे - पहले मंच संचालक श्रोताओं के सामने आता है; इसलिए उसका परिधान, वेशभूषा आदि सहज और गरिमामय होनी चाहिए।

उत्तम मंच संचालक के अंदर आत्मविश्वास, सतर्कता, सहजता के साथ ओताओं का उत्साह बढ़ाने का गुण होना आवश्यक है। इसके अलवा मंच संचालक में समयानुकूल छोटे छोटे चुटकुलों तथा रोचक घटनाओं से ओताओं को बाँध रखने की शक्ति भी जरूरी है। अच्छे मंच संचालक को भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना


आवश्यक है। भाषाकी शुद्धता, शब्दों का चयन, शब्दों का उचित


प्रयोग तथा किसी प्रख्यात साहित्यकार के कथन का उल्लेख कार्यक्रम को प्रभावशाली एवं हृदयस्पर्शी बना देता है। यही उत्तम मंच संचालक की थाती होती है! उत्तम मंच संचालक बननेवाले व्यक्ति को उपर्युक्त गुणों को आत्मसात करना आवश्यक है!






कार्यक्रमों तथा समारोहों की सफलता या असफलता की सारी जिम्मेदारी सूत्र संचालक की होती है। सूत्र संचालक का कार्य विविधतापूर्ण होता है। आजकाल शादी-विवाह में संगीत संध्या कार्यक्रम, बर्थडे पार्टी, शादी की वर्षगाँठ कार्यक्रम, विदाई समारोह, शासकीय कार्यक्रम, राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा दूरदर्शन पर आयोजित परिचर्चा, आकाशवाणी पर होनेवाली चर्चाओं में सूत्र संचालक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शासकीय तथा राजनैतिक कार्यक्रमों में सूत्र संचालक को पद, गरिमा वरिष्ठता तथा प्रोटोकॉल का ध्यान देना पड़ता है। वहीं पर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होनेवाली बहस, परिचर्चा में कार्यक्रम की संपूर्ण जानकारी एवं विषय की गंभीरता का ज्ञान होना चाहिए। संगीत संध्या, जन्मदिन पार्टी, वैवाहिक वर्षगाँठ समारोह तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में संचालक की वाक्पटुता, हाजिर जवाबी, हास्य-व्यंग्य तथा शेर एवं काव्य पाठ्य समारोह में चार चाँद लगा देती है। कार्यक्रम की रोचकता एवं सरसता का संपूर्ण दायित्व सूत्रसंचालक के ऊपर निर्भर करता है। सूत्र संचालक श्रोताओं और मंच के बीच कड़ी का काम करता है। एक तरफ जहाँ पर मंच पर उपस्थित श्रेष्ठजनों की क्रमवार वरिष्ठता एवं लोकप्रियता का ध्यान रखना पड़ता है वहीं दूसरी तरफ श्रोताओं की कार्यक्रम में रूवि बनाए रखने के प्रति संचालक की महती जिम्मेदारी होती है।


अथवा


(6 अंक)








Tuesday, December 7, 2021

उषा की दीपावली

                 हिंदी युवकभारती 

                  कक्षा ग्यारहवीं

                     २. लघुकथाएँ


                                     लेखक - श्रीमती संतोष श्रीवास्तव

लेखक परिचय : संतोष श्रीवास्तव जी का जन्म २३ नवंबर १९५२ को मंडला (मध्य प्रदेश) में हुआ। आपने एम.ए. | (इतिहास, हिंदी), बी.एड तथा पत्रकारिता की उपाधियाँ प्राप्त की। नारी जागरूकता और उसकी अस्मिता की पहचान | आपकी लेखनी के विषय हैं। आपकी रचनाओं में एक ओर वर्तमान स्थितियों तथा सामाजिक विसंगतियों का चित्रण दृष्टिगोचर होता है तो वहीं दूसरी ओर जीवन जीने की छटपटाहट और परिस्थितियों से लड़ने की सार्थक सोच भी है।

 प्रमुख कृतियाँ : 'बहके बसंत तुम', 'बहते ग्लेशियर' (कहानी संग्रह) 'दबे पाँव प्यार', 'टेम्स की सरगम', 'ख्वाबों के पैरहन'(उपन्यास), 'फागुन का मन' (ललित निबंध संग्रह), 'नीली पत्तियों की शायराना हरारत' (यात्रा संस्मरण) आदि। | विधा परिचय: 'लघुकथा' हिंदी साहित्य में प्रचलित विधा है। यह गद्य की ऐसी विधा है जो आकार में लघु है पर कथा के तत्त्वों से परिपूर्ण है। कम शब्दों में जीवन की संवेदना, पीड़ा, आनंद को सघनता तथा गहराई से प्रस्तुत करने की क्षमता इसमें होती है। किसी परिस्थिति या घटना को लेखक अपनी कल्पना का पुट देकर रचता है। हिंदी साहित्य में डॉ. कमल किशोर | गोयनका, डॉ. सतीश दुबे, संतोष सुपेकर और कमल चोपड़ा आदि प्रमुख लघुकथाकार हैं। 

पाठ परिचय: उषा की दीपावली' लघुकथा अनाज की बरबादी पर बालमन की संवेदनशीलता और संस्कारों को जाग्रत कराती है। एक ओर थालियाँ भर-भरकर जूठन छोड़ने वाले लोग हैं तो दूसरी ओर अनाज के एक-एक कौर को तरसते और विभिन्न तरीकों से रोटी का जुगाड़ करते लोग हैं। 'मुस्कुराती चोट' लघुकथा आर्थिक अभाव के कारण पढ़ाई न कर पाने की | विवशता तथा मजदूरी करके अपनी पढ़ाई जारी रखने की अदम्य इच्छा को दर्शाती है। यह बाल मजदूरी जैसी समस्या को इंगित करते हुए होसला देती, आशाबाद को बढ़ाती सकारात्मक और संवेदनशील लघुकथा है।

                                लघुकथा 

                          उषा की दीपावली

दादी ने नरक चौदस के दिन आटे के दीप बनाकर मुख्य द्वार से लेकर हर कमरे की देहरी जगमगा दी थी। घर पकवान की खुशबू से तरबतर था। गुझिया, पपड़ी, चकली आदि सब कुछ था। मगर दस वर्षीय उषा को तो चॉकलेट और बंगाली मिठाइयाँ ही पसंद थीं। दादी कहती हैं कि "तेरे लिए तेरी पसंद की मिठाई ही आएगी। यह सब तो पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों, घर आए मेहमानों के लिए हैं।"

आटे के दीपक कंपाउंड की मुंडेर पर जलकर सुबह तक बुझ गए थे। उषा जॉगिंग के लिए फ्लैट से नीचे उतरी तो उसने देखा पूरा कंपाउंड पटाखों के कचरे से भरा हुआ था। उसने देखा, सफाई करने वाला बबन उन दीपों को कचरे के डिब्बे में न डाल अपनी जेब में रख रहा था। कृशकाय बबन कंपाउंड में झाडू लगाते हुए हर रोज उसे सलाम करता था। "तुमने दीपक जेब में क्यों रख लिए ?" उषा ने पूछा। “घर जाकर अच्छे से सेंककर खा लेंगे, अन्न देवता हैं न।" बबन ने खीसे निपोरे।

उषा की आँखें विस्मय से भर उठीं। तमाम दावतों में भरी प्लेटों में से जरा-सा दूँगने वाले मेहमान और कचरे केडिब्बे के हवाले प्लेटों का अंबार उसकी आँखों में सैलाब बनकर उमड़ आया। वह दौड़ती हुई घर गई। जल्दी-जल्दी पकवानों से थैली भरी और दौड़ती हुई एक साँस में सीढ़ियाँ उतर गई... अब वह थी और बबन की काँपती हथेलियों पर पकवान की थैली। उषा की आँखों में हजारों दीप जल उठे और पकवानों की थैली देख बबन की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए ।

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पाठ्य पुस्तक में दिए गए स्वाध्याय:-👇

 शब्दार्थ :

कृशकाय = दुबला-पतला शरीर

तरबतर = गीला, भीगा

बेरहमी = निर्दयता, दयाहीनता


आकलन


१) लिखिए :

(अ) दावत में होने वाली अन्न की बरबादी पर उषा की प्रतिक्रिया --

उत्तर - दावतों में मेहमान प्लेट भर-भर कर खाना लेते हैं और जरा-जरा सा दूँग कर जूठे खाने से भरी प्लेट कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। दूसरी ओर अनेक ऐसे लोग हैं, जो दानेदाने के लिए तरसते हैं और वे भूखे-पेट सो जाते हैं। यह सोच कर उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।


(आ) संवादों का उचित घटनाक्रम-

(१) “रुपये खर्च हो गए मालिक"

(२) "स्कूल नहीं जाता तू? अजीब है...!"

(३) “अरे क्या हुआ! जाता क्यों नहीं?" "

(४) “माँ, बाल मजदूरी अपराध है न?"

उत्तर :-संवादों का उचित कर्म निम्नलिखित प्रकार से है:-

(1) "स्कूल नहीं जाता तू? अजीब है...! " 

(2) "माँ, बाल मजदूरी अपराध है न?"

(3) "अरे क्या हुआ! जाता क्यों नहीं?

(4) "रुपए खर्च हो गए मालिक।'


शब्द संपदा :-

समूह में से विसंगति दशनिवाला कृदंत/तद्धित शब्द चुनकर लिखिए :-


(१) मानवता, हिंदुस्तानी, ईमानदारी, पढ़ाई

उत्तर :- पढ़ाई :- (पढ़ + आई - कृत प्रत्यय) -  कृदंत

(२) थकान, लिखावट, सरकारी, मुस्कुराहट

उत्तर :-सरकारी: (सरकार + ई - तद्धित प्रत्यय)तद्धित

(३) बुढ़ापा, पितृत्व, हँसी, आतिथ्य

उत्तर :- हँसी:-(हँस + ई - कृत प्रत्यय) कृदंत

(४) कमाई, अच्छाई, सिलाई, चढ़ाई

उत्तर :- अच्छाई:- (अच्छा + आई- तद्धित प्रत्यय) तद्धित

(आ) निम्नलिखित वाक्यों में आए हुए शब्दों के वचन परिवर्तन करके वाक्य फिर से लिखिए  :-


(१) पेड़ पर सुंदर फूल खिला है।

उत्तर :- पेड़ों पर सुंदर फूल खिले हैं।

 (२) कला के बारे में उनकी भावना उदात्त थी।

उत्तर :- कलाओं के बारे में उनकी भावना उदात्त थी।

(३) दीवारों पर टँगे हुए विशाल चित्र देखे ।

उत्तर :- दीवार पर टँगा हुआ विशाल चित्र देखा।

(४) वे बहुत प्रसन्न हो जाते थे।

उत्तर :- वह बहुत प्रसन्न हो जाता था।

(५) हमारी तुम्हारी तरह इनमें जड़ें नहीं होतीं।

उत्तर :- मेरी-तुम्हारी तरह इसमें जड़ नहीं होती।

(६) ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे।

उत्तर :- यह आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहा.            था।

 (७) वह कोई बनावटी सतह की चीज है|

उत्तर :- वे कोई बनावटी सतह की चीजें हैं।






Wednesday, December 1, 2021

प्राचीनकाले प्रसाधनम्

                       तृतीय मंडलम्

                        द्वितीय: पाठ: |

                   प्राचीनकाले प्रसाधनम्


भाषाभ्यासः ।


.माध्यमभाषया सन्दर्भ स्पष्टीकुरुत।ह

१) तदर्थं विविधप्रसाधनसाहित्यस्य प्रभूतम् उपयोजनं भारतीयाः

     कृतवन्तः ।

उत्तरः अर्थः त्यासाठी निरनिराळ्या प्रसाधन साहित्याचा वापर ● भारतीयांनी मोठ्या प्रमाणात केला.

संदर्भ : - प्रस्तूत संदर्भ 'संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांची सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे.

स्पष्टीकरण :- हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील : आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा वेरूळ गुहातून तसेच चित्रकलांमधून लोक प्रसाधने वापरलेले दिसतात. महाभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

प्रसाधन हे मानवी जीवनाचे महत्त्वपूर्ण अंग आहे. फार पूर्वीपासून स्त्री पुरुषांना प्रसाधन कला अवगत होती असे दिसते वेद, ऋतुसंहार मेघदूत, बृहत्संहिता, मानसोल्लास या संस्कृत प्राकृत काव्यांमधून देखील प्रसाधनांचे बरेच संदर्भ मिळतात. प्राचीन काळात सौंदर्यस्पर्धा पण घेतल्या जात होत्या. उत्खननात प्राचीन प्रसाधनसाधने मिळाली. यावरून असे लक्षात येते की प्राचीन काळापासून केवळ स्त्रियांनाच नाही तर पुरुषांना सुद्धा प्रसाधनकला अवगत होती. त्यासाठी निरनिराळे प्रसाधन साहित्य भारतीयांनी भरपूर प्रमाणात वापरले.

वैशिष्ट्यः- भारतात प्राचीन काळापासून स्त्री आणि पुरुष स्वतःचे • सौंदर्य वाढविण्यासाठी अनेक प्रकारच्या प्रसाधनांचा वापर करीत होते.


२) प्रसाधनस्य द्वौ विभागौ।

 उत्तरः अर्थः- प्रसाधनाचे दोन विभाग आहेत.

संदर्भ :- प्रस्तूत संदर्भ 'संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांच्या सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे. स्पष्टीकरण हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा 'वेरूळ तसेच चित्रकलांमधून त्याकाळी लोक प्रसाधने वापरताना दिसतात. महाभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

प्रसाधनांची १६ अंगे आहेत. प्रसाधनाचे दोन विभाग आहेत. पहिले आंतरिक प्रसाधन तसेच दुसरे बाह्यप्रसाधन! शरीराचे -'निरोगित्व' हे आंतरिक प्रसाधन आहे. उचित आहार, निद्रा, जलपान व्यायाम ही आंतरिक प्रसाधने आहेत. बाह्य प्रसाधनात दन्तधावन (दात घासणे), केश सम्मार्जन, स्नान, विलेपन इ. येते. स्नानासाठी साबण, वनौषधीयुक्त चूर्णे वापरली जातात. विलेपनाने त्वचा मऊ मुलायम होते. दुर्गंध नष्ट होतो.

वैशिष्ट्यः- प्रसाधन हे दोन प्रकारचे असते. केवळ चेहऱ्यावर क्रीम, पावडर लावून चालत नाही तर आतून निरोगी राहणेसुद्धा महत्त्वाचे असते.


३) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् ।

 उत्तरः अर्थः- ऋतुला अनुसरून प्रसाधन करावे.

संदर्भ:- प्रस्तूत संदर्भ संस्कृत आह्लादः' पुस्तकातून घेतलेल्या उ "प्राचीनकाले प्रसाधनम्" या पाठातील आहे प्राचीन भारतीयांची सौंदर्य प्रसाधनाविषयी माहिती दिली आहे.

स्पष्टीकरण :- हे वाक्य 'प्राचीनकाले प्रसाधनम्' या पाठातील आहे. फार पूर्वीपासून लोक प्रसाधने वापरत आहेत. रामायण, महाभारत, पुराणे, कौटिलीय अर्थशास्त्र, जातककथा यामध्ये प्रसाधनांची बरीचशी अंगे वर्णन केली आहेत. आयुर्वेद ग्रंथात सुद्धा आरोग्यदृष्ट्या प्रसाधनांचे विवरण केले आहे. अजिंठा वेरूळ तसेच चित्रकलांमधून लोक प्रसाधने वापरत असत असे दिसते.महांभारतात द्रौपदीने सैरंध्रीच्या रूपाने सुदेष्णेचे प्रसाधन केले आहे. अनसूयेने देखील सीतेसाठी प्रसाधने तयार केली होती.

ऋतुप्रमाणे प्रसाधन करावे. उन्हाळ्यात चंदनाचा लेप द्यावा, सुती कपडे वापरावेत, मोत्याच्या माळा घालाव्यात तर थंडीच्या ऋतुत लोकरी कपडे घालावेत, चंदनाची धुरी घ्यावी, केशर वापरावे. केशसंवर्धनासाठी ब्राह्मी, आवळा, माका या वनौषधींची तेल वापरावे. केसांना धूपन केल्यामुळे घाम व ऊवा निघून जातात. फुले, मोती इत्यादीच्या, माळांनी केस सजवावेत. मुखाच्या सौदर्यासाठी हळद व मध याचे मिश्रण मुखास लावावे. लोध फुलांच्या परागाच्या चूर्णाने मुखाचे तेज वाढते व शोभते. अंगाला सुवासिक द्रव्याची उटी लावावी. विड्याने ओठ रंगावावेत काजळाच्या काडीने डोळ्यांना सुशोभित करावे. नखे रंगवावीत गालांना सुवासिक उटी लावावी. वैशिष्ट्य : वर्षभर एकाच प्रकारची प्रसाधने किंवा क्रीम, पावडर लावू नयेत. ऋतुनुसार आणि आपल्या त्वचेला हितकारक अशी प्रसाधने वापरावीत.


२. उचितं कारणं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) प्राय: सर्वे जनाः प्रसाधनं कुर्वन्ति, यतः .....|

अ) जनाः प्रसाधनप्रियाः ।

आ) प्रसाधनैः विना जीवितुं न शक्यते ।

उत्तर :-प्राय: सर्वे जनाः प्रसाधनं कुर्वन्ति, यतः  जनाः प्रसाधनप्रियाः ।


२) ऋतुम् अनुसृत्य एव प्रसाधनं क्रियते, यतः .....|

अ) ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं कर्तुं न शक्यते । 

आ) ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं हिताय न भवति ।

उत्तर :- ऋतुम् अनुसृत्य एव प्रसाधनं क्रियते, यतः ऋतुविरुद्धं प्रसाधनं हिताय न भवति ।


३) केशधूपनं काले काले कर्तव्यम्, यतः ... । 

अ) केशधूपनेन विना प्रसाधनं न शोभते ।

आ) केशधूपनेन स्वेदयूकादयः नश्यन्ति ।

उत्तर:-३) केशधूपनं काले काले कर्तव्यम्, यतः  केशधूपनेन स्वेदयूकादयः नश्यन्ति ।


३. उचितं वाक्यांशं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत ।

१) उचिताहार-निद्रा-जलपान-व्यायामादिकैः - ...

अ) बाह्यप्रसाधनं साध्यम् । 

ब) आन्तरिकप्रसाधनं साध्यम् ।

उत्तर:- उचिताहार-निद्रा-जलपान-व्यायामादिकैः..                             आन्तरिकप्रसाधनं साध्यम्  । 

२) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनम् -

 अ) ग्रीष्मकाले कृष्णागरुधूपनं शिशिरकाले चन्दनविलेपनम् |

ब) ग्रीष्मकाले चन्दनविलेपनम्, शिशिरकाले कृष्णागरुधूपनम् ।

उत्तर:- ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनम् - ग्रीष्मकाले                                चन्दनविलेपनम्, शिशिरकाले कृष्णागरुधूपनम् ।

३) प्राचीनप्रसाधनानां विशेषः यत् तत्र 

अ) कृतकानां रसायनबहुलानां प्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।

ब) नैसर्गिकप्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।

उत्तर:- प्राचीनप्रसाधनानां विशेषः यत् तत्र:- नैसर्गिकप्रसाधनानां प्राचुर्यम् ।


४. उचितं शब्दं चित्वा चतुष्कोणं पूरयत।

१) सुविदितानां कलानां सङङ्ख्या = चतुष्षट्टिकला |

२) प्राचीनकाले आयुज्यमाना एका सौन्दर्यस्पर्धा = जनपद.                       कल्याणी /नगर सौभिनी |

३) प्रसाधनकलायाः षोडश-अङ्गेषु एकम् = मर्दनम् |

४) एकं बाह्यप्रसाधनम् = दंतधावनम् |

५) एक: केशरचनाविशेषः =चुडावेणी |

 ६) प्रसाधनस्य परमोत्कर्षः = भूषणविन्यास |

७) गाहासत्तसई वर्णिता = प्रसाधनकला |

८) वनौषधियुतैः चूर्णकैः विलेपनेन मृदुतरा भवति = त्वक् ।


५. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत।

१) प्रसाधनकला केषु काव्येषु वर्णिता अस्ति?

उत्तरः प्रसाधनकला वेदादिषु ऋतुसंहार मेघदूत वर्णिता अस्ति। 

२) प्रसाधनकलाया: कति अङ्गानि सन्ति ?

उत्तर: प्रसाधनकलायाः षोड्श अङ्गानि सन्ति । 

३) केशसंवर्धनस्य कृते किम् आवश्यकम् ?

उत्तर: केशसंवर्धनस्य कृते तेलेन शिरोमर्दनम् आवश्यकम्। 

४) केशधूपनेन किं भवति?

उत्तर: केशधूपनेन स्वेदयूकादीनां नाशः भवति।

५) मुखे केन गौरकान्तिः शोभते ?

उत्तरः मुखे हरिद्रामधुमिश्रितेन लेपेन गौरकान्तिः शोभते।

६) केन ओष्ठौ रञ्जनीयौ ?

उत्तर: सिक्थयुक्तेन आलक्तकेन वा ताम्बुलेन ओष्ठौ रञ्जनीयौ।

७) करचरणाः कथं प्रसाधनीयाः ?

उत्तर: करचरणा: आलक्तकेन प्रसाधनीयाः। 

८) हर्षचरिते के पटभेदाः निरूपिताः ?

उत्तरः हर्षचरिते बाणकविना दुकूल- कौशेय चीनांशुक -                    क्षौमादय पटभेदाः निरूपिताः ।

९) प्राचीनप्रसाधनविषये कः विशेषः लक्षणीयः ? 

उत्तरः प्राचीनप्रसाधनविषये नैसर्गिकतया उपलब्धानां.                       प्रसाधनानां प्राचर्युम् इति लक्षणीयः ।


६. वाक्यं पुनर्लिखित्वा सत्यम्/असत्यं लिखत ।

१) प्रसाधनं नाम मानवजीवनस्य महत्त्वपूर्णम् अङ्गम् |

उत्तर - सत्यम्

२) प्रसाधनकलायाः चतुष्षष्टिः अङ्गानि सन्ति ।

उत्तर - असत्यम्

३) मुखसौन्दर्यस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धा ।

   उत्तर - सत्यम्

 ४) प्रसाधनस्य परमोत्कर्षः नाम केशसंवर्धनम् ।

       उत्तर - असत्यम्

७. रेखाङ्कितं पदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत ।

१) चित्रशिल्पेषु नैकविधाः प्रसाधनपराः जनाः दृश्यन्ते।

उत्तरः केष नैकविधाः प्रसाधनपराः जनाः दृश्यन्ते ?

२) प्रसाधनकलायाः षोडशः अङ्गानि सन्ति ।

उत्तरः प्रसाधनकलायाः कति अङ्गानि सन्ति ?

३) शिशिरे ऊर्णावस्त्रं कृष्णागुरुधूपनं तथा कुड्कुममण्डनम् 

उत्तरः कदा ऊर्णावस्त्रं कृष्णागुरुधूपनं तथा कुङ्कुममण्डनम् ?

४) विलेपनेन त्वक् उज्वला मृदुतरा च भवति ।

उत्तरः केन त्वक् उज्वला मृदुतरा च भवति ?

५) मुखसौन्दर्यस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धाः । 

 उत्तरः कस्य कृते बहवः कल्पाः प्रसिद्धाः ?

६) उत्खननेषु प्राचीनानि प्रसाधनसाधनानि प्राप्तानि |

उत्तरः केष प्राचीना नि प्रसाधनसाधनानि प्राप्तानि ?


सर्वनामस्थाने नाम / नामस्थाने सर्वनाम प्रयुज्य वाक्यं पुनर्लिखत ।


१) वेदपूर्वकालादेव न केवलं स्त्रियः किन्तु पुरुषाः अपि प्रसाधनकलायां निपुणाः |( तद्) 

उत्तरः वेदपूर्वकालादेव न केवलं स्त्रियः किन्तु पुरुषाः अपि तस्याम्  |

२) तासु प्रसाधनविषयकाः नैका कला: निर्दिष्टाः । (चतुष्पष्टिकला)

उत्तर: चतुष्पष्टिकलासु प्रसाधनविषयकाः नैकाः कलाः निर्दिष्टाः ।

३) प्रसाधनस्य द्वौ विभागौ-आन्तरिकप्रसाधनं तथा बाह्यप्रसाधनम् । (तद्)

उत्तरः तस्य द्वौ विभागौ-आन्तरिकप्रसाधनं तथा बाह्यप्रसाधनम्।

४) ऋतुम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् इति सूचितम् । (एतद्)

उत्तरः एतम् अनुसृत्य प्रसाधनं करणीयम् इति सूचितम् ।

 ५) कज्जलशलाकया तयोः अलङ्करणं कर्तव्यम्। (नेत्र)

उत्तर: कज्जलशलाकया नेत्रयोः अलङ्करणं कर्तव्यम् ।





उत्तर :-




२) 


उत्तर :-


   



Saturday, November 27, 2021

पेड़ होने का अर्थ ( कवि डॉ. मुकेश गौतम)

           

                      पेड़ होने का अर्थ

कवि- डॉ. गौतम मुकेश 

Wednesday, November 17, 2021

पाप के चार हथियार

                   पाप के चार हथियार 

                         लेखक :- कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर '


 







 



 




























Saturday, July 31, 2021

"उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद"


"उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद"


कलम के बेताज बादशाह मुंशी जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही नामक एक छोटे से कस्बे में हुआ था| पारिवारिक परिस्थितियों से गुजरने के पश्चात अपनी पढ़ाई पूरी कर वे मुंशी की नौकरी करते थे , तब से प्रेमचंद जी को लोग "मुंशी प्रेमचंद" कहने लगे|

प्रेमचंद जी का रुझान नौकरी करने से ज्यादा अपनी लेखनी की ओर था | उन्होंने सर्वप्रथम उर्दू भाषा में अपना लेखन कार्य आरंभ किया | उर्दू भाषा में वे  "नवाबराय"  से लिखते थे | उनकी लेखनी काल्पनिक  दुनिया से दूर व यथार्थवादीता के नजदीक थी | यही कारण था की "सोजे वतन" उनकी उर्दू भाषा में लिखी गई पुस्तक में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किया जाने वाला अत्याचार व शोषण को दर्शाया गया था| प्रेमचंद की इस पुस्तक  से अंग्रेज तिलमिला उठे और  उन्होंने "सोजे वतन" को ज़ब्त कर लिया था |

प्रेमचंद जी का वास्तविक नाम "धनपतराय" था | उन्होंने हिंदी में लगभग 300 से भी अधिक कहानियां लिखी हैं, जो कि मानसरोवर के आठ खंडों में विभाजित की गई है|  "बड़े घर की बेटी" प्रेमचंद जी की हिन्दी की सबसे पहली व मौलिक कहानी है| भारत किसानों का देश है इसीलिए प्रेमचंद जी को भी छोटे-छोटे गांव, कस्बों से लगाव अधिक रहा है | उन दिनों गांव वालों पर हो रहे अन्याय ,असुविधा आदि से वे भली-भांति परिचित थे| गरीब,किसान, मजदूर, श्रमिक आदि वर्ग पर हो रहे जुल्मों को उन्होंने अपनी आंखों से देखा और वैसे ही लिखा | यही कारण है कि आज भी उनकी कहानियों के पात्र जीवंतता का एहसास दिलाते हैं | 'पूस की रात' का हल्कू को हो या कफन के घीसू और माधव, ईदगाह का हामिद हो या 'बूढ़ी काकी' की काकी यह सारे पात्र समाज में किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है| अत: यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है कि उन्होंने अपनी लेखनी में यथार्थवाद, आदर्शवाद को स्थान दिया |

सन 1918 में, जी हां लगभग 103 वर्ष पहले उन्होंने 'सेवासदन' नामक प्रकाशित उपन्यास लिखा था| जो कि वेश्यावृत्ति पर आधारित हैं| इसके पश्चात 1920 में 'प्रेमाश्रम' जो कि किसान के जीवन पर आधारित हैं, 1925 में 'रंगभूमि' जो एक अंधे भिखारी को कथा का नायक  बनाकर साहित्य में क्रांतिकारी परिवर्तन  किया गया ,1925 में 'निर्मला'  जोकि बेमेल विवाह  पर आधारित उपन्यास हैं1926 में 'कायाकल्प ' 1927 में 'प्रतिज्ञा' 1928 में 'गबन' 1932 में 'कर्मभूमि' तथा 1936 में  'गोदान' उपन्यास लिखकर प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य जगत में "उपन्यास सम्राट" नाम से प्रसिद्ध हो गए | 'मंगलसूत्र' यह प्रेमचंद जी का अंतिम उपन्यास था;परंतु बीच में ही प्रेमचंद जी 8 अक्टूबर 1936 को स्वर्गवास हो जाने से वह उपन्यास अधूरा ही रह गया ,अत: 'गोदान' को ही प्रेमचंद जी का अंतिम पूर्ण उपन्यास माना जाता है| आगे चलकर प्रेमचंद जी के बेटे अमृतराय ने अपने पिता के अधूरे उपन्यास 'मंगलसूत्र' को 1948 में पूर्ण किया | 

प्रेमचंद जी के रचनाओं पर आधारित कई फिल्में व दूरदर्शन पर धारावाहिक आज भी प्रसारित हो रहे हैं|सत्यजित राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फ़िल्में बनाईं। १९७७ में 'शतरंज के खिलाड़ी' और १९८१ में 'सद्गति'। उनके देहांत के दो वर्षों बाद सुब्रमण्यम ने १९३८ में 'सेवासदन' उपन्यास पर फ़िल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। १९७७ में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी 'कफ़न' पर आधारित 'ओका ऊरी कथा' नाम से एक तेलुगू फ़िल्म बनाई, जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। १९६३ में 'गोदान' और १९६६ में 'गबन' उपन्यास पर लोकप्रिय फ़िल्में बनीं। १९८० में उनके उपन्यास पर बना टी.वी. धारावाहिक 'निर्मला' भी बहुत लोकप्रिय हुआ था| 

प्रेमचंद जी के संपादन में सन 1930 में बनारस से 'हंस ' नामक पत्रिका निकाली गई थी| मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस का सम्पादन उनके पुत्र कथाकार अमृतराय ने किया। अनेक वर्षों तक हंस का प्रकाशन बन्द रहा। बाद में मुंशी प्रेमचंद की जन्मतिथि (31 जुलाई) को ही सन् 1986 से अक्षर प्रकाशन ने कथाकार राजेन्द्र यादव के सम्पादन में इस पत्रिका को एक कथा मासिक के रूप में फिर से प्रकाशित करना प्रारम्भ किया। आने वाले वर्षों में यह सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली हिंदी साहित्यिक पत्रिका के रूप में उभरी और आज भी यह हिंदी साहित्य जगत में एक प्रतिष्ठित और विचारशील पत्रिका का स्थान बनाए हुए है। सन् 2013 में राजेन्द्र यादव की मृत्यु के बाद हंस का प्रकाशन और प्रबंध निदेशन उनकी पुत्री रचना यादव द्वारा किया जा रहा है और हिंदी के प्रख्यात कहानीकार संजय सहाय अब हंस के संपादक हैं।


प्रेमचंद जी एक सफल कहानीकार, उपन्यासकार तो थे ही साथ में वे अनुवादक भी रहे | उन्होंने नाटकों की भी रचनाएं की है| हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का स्थान सर्वोपरि है| आने वाली कई भावी पीढ़ियां प्रेमचंद के साहित्य का अध्ययन करेगी| प्रेमचंद हिंदी साहित्य जगत के लिए अनमोल उपहार है|


"मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर सभी साहित्यिक भाई बहनों को  हार्दिक शुभकामनाएं"